Monday, 23 February 2015

कच्ची सरहद

मैं रहता इस तरफ़ हूँ यार की दीवार के लेकिन
मेरा साया अभी दीवार के उस पार गिरता है

बड़ी कच्ची सरहद एक अपने जिस्मों जां की है

तस्वीर

जरा सी पीठ गर नंगी होती
फटे हुए होते उसके कपड़े
लबों पे गर प्यास की रेत होती
और एक दो दिन का फ़ाका होता
लबों पे सुखी हुई सी पपड़ी
जरा सी तुमने जी चिल्ली होती
तो खून का इक दाग़ होता

तो फिर ये तस्वीर बिक ही जाती !

Monday, 9 February 2015

शायद

कोई अटका हुआ है पल शायद
वक्त में पड़ गया है बल शायद

दिल अगर है तो दर्द भी होगा
इसका कोई नही है हल शायद

राख को कुरेद कर देखो
अभी जलता हो कोई पल शायद

Sunday, 1 February 2015

लापता

कबसे ढूंढ़ रहा हूँ खुद को
मिलता ही नही हूँ
ऐसा लगता है मैं छिपा नही लापता हूँ