मैं रहता इस तरफ़ हूँ यार की दीवार के लेकिन
मेरा साया अभी दीवार के उस पार गिरता है
बड़ी कच्ची सरहद एक अपने जिस्मों जां की है
मैं रहता इस तरफ़ हूँ यार की दीवार के लेकिन
मेरा साया अभी दीवार के उस पार गिरता है
बड़ी कच्ची सरहद एक अपने जिस्मों जां की है
जरा सी पीठ गर नंगी होती
फटे हुए होते उसके कपड़े
लबों पे गर प्यास की रेत होती
और एक दो दिन का फ़ाका होता
लबों पे सुखी हुई सी पपड़ी
जरा सी तुमने जी चिल्ली होती
तो खून का इक दाग़ होता
तो फिर ये तस्वीर बिक ही जाती !
कोई अटका हुआ है पल शायद
वक्त में पड़ गया है बल शायद
दिल अगर है तो दर्द भी होगा
इसका कोई नही है हल शायद
राख को कुरेद कर देखो
अभी जलता हो कोई पल शायद