Thursday, 25 September 2014

कुछ नही बदला

भटकती हुई आरजू से हाथ छुटा
तो दोनों जमी पे आ रहे

वो घर पहुची
तो
वो ही हुआ
जो सब दस्तानों में होता है

उसकी शादी तय हो चुकी थी
मेंहदी की महक से घर भरा हुआ था
ढोलों की थाप
सहेलियों की एडियों को जमीन नही लगने देती थी

ढोलक की थाप दूर दराज़ के मोहल्ले तक सुनाई दी

जब उसे खबर मिली
तो
वो भी पहुंचा

खिडकियों,दरवाज़ों से झांक झांक के
उसकी नजर पकड़ने की कोशिश करता रहा

मेहँदी सजी दुल्हन तक पहुंचना मुमकिन नही था

एक सहेली दुल्हन के लिए चाय की प्याली ले के आयी

उसने तो मांगी नही थी

सहेली की आँखों की पलक ने झपक के कहा

पी लो
कप में पैगाम भी है

कप की तह में उसने अंगूठी रख के भेजी थी

अंगूठी होठों से पी ली
और
ऊगली में पहन ली

सहेली की मेहँदी लगी हथेली पर उसने लिख के भेज दिया

उसी सनसेट पे मिलना
जो पुल पे मिला था

लेकिन

संदेशा पंहुचा नही

वो जा चुका था

पल भर में सब बदल गया
और
कुछ भी नही बदला

जो बदला था

वो तो गुज़र गया

सनसेट के रंग

हर रोज़ जब सूरज गोरुब होता
वो उसी पुल पर खड़ी
उसका इंतजार करती

लेकिन

वो नही आया

एक बार फिर जिंदगी का हाथ उसकी उँगलियों से छूटने लगा

सनसेट के रंग कितने कच्चे होते हैं

पुल

सूरज डूबते डूबते गरम कोयले की तरहा डूब गया
और बुझ गया

वो घर से भाग आयी थी
उस रिश्ते से बचने के लिए
जो बिन चाहे उसके दामन से बांधा जा रहा था

उसने संदेशा भिजवाया तो था
उस पुल पे मिलने क लिए
जो दो किनारों को जोड़ता है

हवा जब कोहरे को हिलोरा देती
तो
पूरा पुल झूल जाता
जिंदगी के दोनों सिरे छू लेता

इब्तेदा और इंतेहा
शुरुआत और आखिर

इसी जगहा से उनके रिश्ते की शुरुआत हुई थी

माज़ी से एक आवाज़ आहिस्ता-आहिस्ता उसके करीब आ रही थी

साँस

न परों से उड़े
न पैरों पे चले
उसकी मुस्कराहट ने इतना ही कहा था
बाँहों में उठा लो मुझे
मुझसे चला नही जाता
उस रात
बाहों की इक संदली गिरह
दो सांसे कुछ यूँ उलझी थी
के बस
इक ही साँस होती थी थी

रात कट चुकी थी

वो अभी तक पुल पे खड़ी थी
अतीत से आती आवाज़ और हंसी
बहुत दूर नही लगी
ऐसे ही लगा
जैसे
आवाज़ अभी तक बीती नहीं
शायद कोहरे में हाथ बढ़ाये
तो छू ही ले उसे
घडी देखी
सेकंड की सुई अपने पहरे पर परेड कर रही थी
और
अभी तक
उसके आने की कोई आहट नही थी

रात में क्रैक आ गया था
आधी रात कट चुकी थी

फिर जल भरेगा

आसमान का रंग बदल रहा था
रात कच्ची पड़ रही थी
कोई पंछी पास के पेड़ से उड़ा
और
सुबह को लाने आसमान की तरफ उड़ लिया

वो पुल के उस किनारे पे आ के खड़ी हो गयी
जहाँ से अगला कदम जिंदगी का आखिरी कदम था

इक भोले भाले भेंड के बच्चे ने उसे रोक लिया
गड़ेरिये भटकी हुई भेंडों को राह दिखाते हैं
ईसा भी येही करते थे
उसका हाथ पकड़ के वो अपने साथ ले गया

अरे
ताल से पानी सूखा है
आसमान तो नही सूख गया
फिर मेघ आयेगा
फिर जल भरेगा

Wednesday, 24 September 2014

तेरे जाने से

तेरे जाने से तो कुछ बदला नही
रात भी आयी थी
और चाँद भी था
तेरे जाने से तो कुछ बदला नहीं

साँस भी वैसे ही चलती है हमेशा की तरहा
आंख वैसे ही झपकती है हमेशा की तरहा
थोड़ी सी भीगी हुई रहती है
और कुछ बदला नही

होंठ खुश्क होते हैं
प्यास भी लगती है
आज कल शाम से ही
सर्द हवा चलती है
बात करने से धुआं उठता है
जो दिल का नहीं

तेरे जाने से तो कुछ बदला नही
रात भी आयी थी
और चाँद भी था
हाँ मगर नींद नहीं
नींद नहीं..........

Monday, 22 September 2014

दरिया

वो घर से भाग आयी थी
उस रिश्ते से बचने के लिये
जो बिन चाहे उसके दामन से बांधा जा रहा था

वो कब तक इन्तज़ार करती
कोहरे में खड़ा हुआ पुल तो नज़र आ रहा था
लेकिन उसके सिरे नज़र नहीं आते थे
कभी लगता उसके दोनों सिरे एक ही तरफ़ हैं
और कभी लगता इस पुल का कोई सिरा नहीं है

शाम बुझ रही थी
और आने वाले की कोई आहट नहीं थी कहीं

नीचे बहता दरिया कह रहा था
आओ मेरे आग़ोश में आ जाओ
मैं तुम्हारी बदनामी के सारे दाग छुपा लूंगा

मट्टी के इस शरीर से बहुत
खेल चुके
इस खिलौने के रंग अब उतरने लगे हैं
कच्चे रंग उतर जाने दो
नदी में इतना है पानी
सब धुल जाएगा
मट्टी का टीला है
ये घुल जाएगा
इतनी सी मट्टी है
दरिया को बहना है
दरिया को बहने दो
सारे रंग बिखर जाने दो

Sunday, 7 September 2014

An apricot and a walnut

An apricot and a walnut stood for long close together
when their shadows fell in water
sometimes as far as going to the other shore altogther…
the walnut still gazes in the direction the river flows
but its height has slightly shrunk
now its shadow does not reflect in the water.

The night in the mountains

The night in the mountains is something else
The sky never darkens and the river is for-ever alight
So much zari-work can be seen in the sky through the patterns of stars
The wind speaks like someone holding a comb between its teeth
two waterfalls speak so loudly to each other
like rustic friend meeting unexpectedly in a valley
discussing the entire village
Even a poem sleeps with its eyes half closed
The night in the mountains is something else.

Soul

Have you seen the soul?
ever sensed it?
standing against the wall of a church on the shore
have you sensed your womb resounding!
the body burnt a hundred times is still a clod of earth
the soul burnt but once becomes gold!

Books

A sigh escapes as I turn a page
the meanings of many words have fallen off
They appear like shrivelled leafless stumps
where meaning will grow no more
Many traditions lie scattered
like the debris of earthen cups
made obsolete by glass tumblers
Each turn of the new page brought a new flavor to the tongue

किताबें

कोई सफ़ा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे ठूँठ लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते
बहुत-सी इस्तलाहें हैं
जो मिट्टी के सकोरों की तरह बिखरी पड़ी हैं
गिलासों ने उन्हें मतरूक कर डाला
ज़ुबान पर ज़ायका आता था जो सफ्हे पलटने का

डर

उम्मीद भी है घबराहट भी
कि अब लोग क्या कहेंगे,
और इससे बड़ा डर यह है कि
कहीं ऐसा न हो कि लोग कुछ भी न कहें।

रात भर

रात भर
ये मोगरे की खुशबू कैसी थी
अच्छा!
तो तुम आये थे नींदों में मेरे?

एक था बचपन....

एक था बचपन
छोटा सा,
नन्हा सा बचपन,
बचपन के एक बाबूजी थे,
अच्छे सच्चे बाबूजी थे
दोनो का सुंदर था बंधन,

टहनी पर चढ़के जब फूल बुलाते थे
हाथ उँचके तो टहनी तक ना जाते थे
बचपन के नन्हे दो हाथ उठाकर
वो फूलों से हाथ मिलाते थे

चलते चलते,
जाने कब इन राहों में
बाबूजी बस गये बचपन की बाहों में
मुट्ठी में बंद हैं वो सूखे फूल अभी
खुशबू हैं जीने की चाहों में

मेरे होंठों पर उनकी आवाज़ भी हैं
साँसों में सौंपा विश्वास भी हैं
जाने किस मोड़ पे कब मिल जायेंगे वो
पूछेंगे बचपन का एहसास भी है

एक था बचपन....

Saturday, 6 September 2014

यक्ष ने पूछा

हवा से तेज़ क्या है
यक्ष ने पूछा
जियादा घास से उगता है क्या
दिमाग
ए यक्ष हवा से तेज़ चलता है
ख़याल उगते हैं बिन बीजे,
बिना सोचे कहीं भी....

रात पहाड़ों पर

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है
आसमां बुझाता ही नहीं
और दरिया रोशन रहता है
इतना ज़री का काम नज़र आता है
फ़लक पे तारों का
कंघी रख के दांतों में आवाज़ किया करती है हवा
कुछ फटी-फटी झीनी-झीनी,
बालिग़ होते लड़कों की तरह
इतना उंचा-उंचा बोलते हैं दो झरने आपस में
जैसे एक देहात के दोस्त
अचानक मिल कर वादी में गाँव भर का पूछते हों
नज़्म भी आधी आँखें खोल के सोती है
रात पहाड़ों पे कुछ और ही होती है.

बारिश

बारिश आती है
तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है
टीन की छत,
तिरपाल का छज्जा,
पीपल-पत्ते,
परनाला सब बजने लगते हैं
तंग गली में जाते-जाते
साइकिल का पहिया
पानी की कुल्लियाँ करता है
खुश्क था
तो रस्ते में टिक-टिक छतरी टेक के चलते थे
बारिश में आकाश में छतरी टेक के टप-टप चलते हैं.

do not erase

Do not erase these lines
let them be.

My Childhas drawn them,
with her little pink hands.

Curved and curly.

What if the lines
do not make a form?

In these lines,
I see my child's hands.

In these lines,
I see myself.

अमृत

समंदर देख रहा था मैं
समन्दर के अन्दर से मेरी अमृत की कुम्भी आने वाली थी
समन्दर करवटें लेता था रह रह कर
तो बल पड़ते थे पानी में
मेरी बच्ची के नाज़ुक कोख से टीसें गुज़रती हैं
मुझे उस वक्त डर लगता था अमृत मांगने से

मच्छर

ज़हरीले मच्छर मारो आवाजों के
सूजन हो जाती है उनके काटे से
मच्छरदानी तान के जीना मुश्किल है

Friday, 5 September 2014

शायद

दिल अगर है तो दर्द भी होगा
इसका कोई नहीँ है हल शायद
राख को भी कुरेद कर देखो
अब भी जलता हो कोई पल शायद..

इक रोज

उस मोड़ पे बैठा हूँ,
जिस मोड़ से जाती हैं,
हर एक तरफ़ राहें

इक रोज़ तो यूँ होगा,
इस मोड़ पे आकर तुम रूक जाओगी,
कह दोगी
वह कौन सा रस्ता है
जिस राह पे जाना है.