Monday, 19 May 2014

मकां की ऊपरी मंज़िल पे अब कोई नहीं रहता

मकां की ऊपरी मंज़िल पे अब कोई नहीं रहता,
वो कमरे बन्द हैं कब से
जो चौबीस सीढियां उन तक पहुंचती थी,
वो अब ऊपर नहीं जाती.
मकां की ऊपरी मंज़िल पर
अब कोई नहीं रहता

वहां पर कमरों मे इतना याद है मुझको,
खिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थे,
बहुत से तो उठाने, फ़ेंकने, रखने में चूरा हो गये थे.

वहां एक बालकनी भी थी,
जहां एक बेंत का झूला लटकता था.
मेरा एक दोस्त था 'तोता',
वो रोज़ आता था,
उसको हरी मिर्ची खिलाता था,

उसी के सामने छत थी जहां
एक मोर बैठा, आसमान पर
रात भर मीठे सितारे चुगता रहता था.

मेरे बच्चों ने वो देखा नहीं,
वो नीचे की मंज़िल पे रहते हैं,
जहां पर पियानो रखा है,
पुरानी पारसी स्टाइल का
फ़्रेजर से खरीदा था.
मगर कुछ बेसुरी आवाज़ें करता है,
कि उसकी रीड्स सारी हिल गयी हैं,
सुरों पर दूसरे सुर चढ गये हैं

उसी मंज़िल पे एक पुश्तैनी बैठक थी...

मकां ज़रा बड़ा है
इसलिये नज़्म भी बढ़गयी है...
माफ़ कीजियेगा,
कमरे ज्यादाहैं..

जहां पुरखों की तस्वीरें लटकती थी
मैं सीधा करता रहता था
हवा फ़िर टेढा कर जाती
बहू को मूंछो वाले सारे पुरखे’
क्लिशे’ लगते थे,

मेरे बच्चों ने आखिर उनको कीलों से उतारा
पुराने न्यूज़पेपर मेंउन्हें महफ़ूज़ करके रख दिया था,

मेरा एक भांजा ले जाता है
फ़िल्मों में कभी सेट पर लगाता है
किराया मिलता है उनसे.

मेरी मंज़िल पे मेरे सामने मेहमानखाना है
मेरे पोते कभी अमरिका से आयें तो रुकते हैं
अलग साइज़ में आते हैं,
जितनी बार आते है
खुदा जाने वो ही आते हैं या
हर बार कोई दूसरा आता है

वो एक कमरा जो पीछे की तरफ़ बन्द है
जहां बत्ती नहीं जलती
वहां एक रोज़री रखी है वो उस से महकता है
वहां वो दाई रहती थी
जिसने तीन बच्चों को बड़ा करने में
अपनी उम्र दे दी थी
मरी तो मैने दफ़नाया नहीं,
महफ़ूज़ करके रख दिया उसे

और उसके बाद एक दो सीढ़ियां है
नीचे तहखाने में जाती है
जहां खामोशी रोशन है,
सुकूं सोया है
बस इतनी सी पहलू में जगह रखकर
कि जब मैं सीढ़ियों से नीचे आऊं
तो उसी के पहलू में,
बाजुओं पर सर रखकर गले लग जाऊं
सो जाऊं

मकां की ऊपरी मंज़िल पे अब कोई नहीं रहता....

छतरी

नीली आसमानी छतरी
धरती का उड़न खटोला
डोले तो लागे हिन्डोला
उड़े कभी, भागे कभी
भागे कभी, दौड़े कभी
समझे ना माने छतरी

अम्बर का टुकड़ा तोड़ा
लकड़ी का हत्था जोड़ा
हाथ में अपना आसमान है

छतरी लेके चलती हूं
मेमों जैसी लगती हूं
गोरों का दिल बेईमान है
खूंटी कभी, लाठी कभी
लाठी कभी, छड़ी कभी
पाजी शैतानी छतरी

बारिश से जो रिश्ता है
पानी पे मन खिंचता है
पिछली कोई पह्चान है

शायद फिर उड़ना चाहे
अम्बर से जुड़ना चाहे
भोली है अन्जान है
डूबे कभी, तैरे कभी
गोते खाती जाये कभी
करे नादानी छतरी

इतिहास का हिस्सा

कहीं न कहीं जाकर चीज़ें इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं
और उसे बनने देना चाहिए
न कि हर बार उन्हें झाड़-पोंछकर,
खुरचकर बाहर निकालें.
ख़राशों को नाख़ूनों से खरोंचा न जाए
तो ही बेहतर है
क्योंकि ये ज़ख़्म भर चुके हैं
और उन्हें भरने देना चाहिए

ये बूढ़े लोग अजब होते हैं

ये बूढ़े लोग अजब होते हैं

छाज में डाल के
माज़ी के दिन
कंकर चुन कर
दांत तले रख कर उनको
फिर से तोड़ने की कोशिश करने लगते हैं

तीस बरस की उमर मे जब हुआ दांत ना टूटा
सत्तर साल की उम्र मे तो दांत ही टूटेगा

चलो चलें

नये नये ही चाँद पे रहने आये थे
हवा ना पानी,
गर्द ना कूड़ा
ना कोई आवाज़,
ना हरक़त

ग्रेविटी पे तो पाँव नहीं पड़ते हैं
कहीं पर
अपने वतन का भी अहसास नही होता

जो भी घुटन है जैसी भी है,
चल कर ज़मीं पर रहते हैं
चलो चलें,
चल कर ज़मीं पर रहते ह

Thursday, 15 May 2014

है लौ ज़िन्दगी

है लौ जिन्दगी
जिन्दगी नूर है
मगर इसमें जलने का दस्तूर है
रवायत ये है
के जिन्दगी गहना है
ये हीरा है
और
इसे चाटते रहना है
के लम्हों में मरने का दस्तूर है
अधूरे से रिश्तों में पलते रहो
अधूरी सी साँसों से चलते रहो
यूँ ही जीने जाने का दस्तूर है
है लौ ज़िन्दगी
ज़िन्दगी नूर है..