Friday, 28 February 2014

शायद कहीं काम आए

कुछ ख़्वाबों के ख़त इन में

कुछ चाँद के आईने

सूरज की शुआएँ हैं

नज़मों के लिफाफ़ों में

कुछ मेरे तजुर्बे हैं

कुछ मेरी दुआएँ हैं

निकलोगे सफ़र पर जब

यह साथ में रख लेना

शायद कहीं काम आए

ज़िंदगी सब पे क्यों नहीं आती?

सब पे आती है

सब की बारी से

मौत मुंसिफ़ है

कम-ओ-बेश नहीं

ज़िंदगी सब पे क्यों नहीं आती?

या?

उड़ के जाते हुए पंछी ने
बस इतना ही देखा

देर तक हाथ हिलती रही
वह शाख़ फ़िज़ा में

अलविदा कहने को?
या
पास बुलाने के लिए?

क्या पता

क्या पता
कब कहाँ मारेगी?

बस कि मैं ज़िंदगी से डरता हूँ

मौत का क्या है
एक बार मारेगी

बहुत बौना है ये सूरज

बहुत बौना है ये सूरज

हमारी कहकशाँ की इस नवाही सी galaxy में बहुत बौना सा ये सूरज जो रौशन है
ये मेरी कुल हदों तक रौशनी पहुँचा नहीं पाता
मैं marc और Jupiter से जब गुजरता हूँ

भँवर से ब्लैक होलों के
मुझे मिलते हैं रस्ते में
सियह गिर्दाब चकराते ही रहते हैं
मसल के जुस्तजु के नंगे सहराओं में
वापस फेंक देते हैं

जमीं से इस तरह बाँधा गया हूँ मैं
गले से gravity का दायमी पट्टा नहीं खुलता

सूरज फिर से जलने लगे

बस
चन्द करोड़ों सालों में
सूरज की आग बुझेगी जब

और राख उड़ेगी सूरज से
जब कोई चाँद न डूबेगा

और कोई जमीं न उभरेगी

तब ठंढा बुझा इक कोयला सा
टुकड़ा ये जमीं का घूमेगा

भटका भटका
मद्धम की सी रोशनी में

मैं सोचता हूँ
उस वक्त अगर
कागज़ पे लिखी इक नज़्म कहीं उड़ते उड़ते
सूरज में गिरे
तो सूरज फिर से जलने लगे

आँसू

शीशम
अब तक सहमा सा चुपचाप खड़ा है

भीगा भीगा
ठिठुरा ठिठुरा.

बूँदें पत्ता पत्ता कर के
टप टप करती टूटती हैं तो
सिसकी की आवाजआती है

बारिश के जाने के बाद भी
देर तलक टपका रहता है

तुमको छोड़े देर हुई है
आँसू अब तक टूट रहे हैं