Monday, 2 December 2013

बाज़ी

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैने
काले घर में सूरज चलके
तुमने शायद सोचा था
मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे
मैने एक चराग जलाकर रोशनी कर ली
अपना रस्ता खोल लिया
तुमने एक समन्दर हाथ में लेकर मुझपे ढेल दिया
मैने नोह की कश्ति उस के ऊपर रख दी
काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा
मैने काल को तोड़कर
लम्हा लम्हा जीना सीख लिया
मेरी खुदी को मारना चाहा
तुमने चन्द चमत्कारों से
और मेरे एक प्यादे ने चलते चलते
तेरा चांद का मोहरा मार लिया
मौत की शह देकर तुमने समझा था
अब तो मात हुई
मैने जिस्म का खोल उतारकर सौंप दिया
और रूह बचा ली
पूरे का पूरा आकाश घुमा कर
अब तुम देखो बाज़ी...

Friday, 29 November 2013

बड़ी तकलीफ होती है

मचल के जब भी आँखों से छलक जाते हैं दो आँसू
सुना है आबशारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

खुदारा अब तो बुझ जाने दो इस जलती हुई लौ को
चरागों से मज़ारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

कहू क्या वो बड़ी मासूमियत से पूछ बैठे है
क्या सचमुच दिल के मारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

तुम्हारा क्या तुम्हें तो राह दे देते हैं काँटे भी
मगर हम खांकसारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

आखिरी मौसम

हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है
बदलने वाला है मौसम
नये आवेज़े कानों में लटकते देख कर कोयल ख़बर देती है
बारी आम की आई
कि बस अब मौसम-ऐ-गर्मा शुरू होगा
सभी पत्ते गिरा के गुल मोहर जब नंगा हो जाता है गर्मी में
तो ज़र्द-ओ-सुर्ख़
सब्ज़े पर छपी
पोशाक की तैयारी करता है
पता चलता है कि बादल की आमद है
पहाड़ों से पिघलती बर्फ़ बहती है
धुलाने पैर 'पाइन' के
हवाएँ झाड़ के पत्ते उन्हें चमकाने लगती हैं
मगर जब रेंगने लगती है इन्सानों की बस्ती
हरी पगडन्डियों के पाँव जब बाहर निकलते हैं
समझ जाते हैं सारे पेड़
अब कटने की बारी आ रही है
यही बस आख़िरी मौसम है जीने का
इसे जी लो

सीधा सहल साफ है

किस क़दर सीधा सहल साफ़ है
यह रस्ता देखो
न किसी शाख़ का साया है
न दीवार की टेकन
किसी आँख की आहट
न किसी चेहरे का शोर
न कोई दाग़
जहाँ बैठ के सुस्ताए कोई
दूर तक कोई नहीं
कोई नहीं
कोई नहीं
चन्द क़दमों के निशाँ
हाँ
कभी मिलते हैं कहीं
साथ चलते हैं जो कुछ दूर
फ़क़त चन्द क़दम
और फिर टूट के गिरते हैं
यह कहते हुए
अपनी तनहाई लिये आप चलो
तन्हा अकेले
साथ आए जो यहाँ
कोई नहीं
कोई नहीं
किस क़दर सीधा
सहल साफ़ है यह रस्ता

वक़्त को आते न गुजरते देखा

वक़्त को आते न जाते न गुजरते देखा
न उतरते हुए देखा कभी इलहाम की सूरत
जमा होते हुए एक जगह मगर देखा है
शायद आया था वो ख़्वाब से दबे पांव ही
और जब आया ख़्यालों को एहसास न था
आँख का रंग तुलु होते हुए देखा जिस दिन
मैंने चूमा था मगर वक़्त को पहचाना न था
चंद तुतलाते हुए बोलों में आहट सुनी
दूध का दांत गिरा था तो भी वहां देखा
बोस्की बेटी मेरी
चिकनी-सी रेशम की डली
लिपटी लिपटाई हुई रेशम के तागों में
पड़ी थी
मुझे एहसास ही नहीं था कि वहां वक़्त पड़ा है
पालना खोल के जब मैंने उतारा था उसे बिस्तर पर
लोरी के बोलों से एक बार छुआ था उसको
बढ़ते नाखूनों में हर बार तराशा भी था
चूड़ियाँ चढ़ती-उतरती थीं कलाई पे मुसलसल
और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थी किताबें
मुझको मालूम नहीं था कि वहां वक़्त लिखा है
व्क़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा
जमा होते हुए देखा मगर उसको मैंने
इस बरस बोस्की अठारह बरस की होगी

तो यकी आये

चिपचिपे दूध से नहलाते है
आंगन में खड़ा कर के तुम्हें
शहद भी
तेल भी
हल्दी भी
ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं
गिलासियाँ भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी
जब धुआँ देता
लगातार पुजारी
घी जलाता है
कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो

चुपचाप

कैसे चुपचाप मर जाते हैं
कुछ लोग यहाँ
जिस्म की ठंडी सी
तारीक सियाह कब्र के अंदर
न किसी सांस की आवाज़
न सिसकी कोई
न कोई आह
न जुम्बिश
न ही आहट कोई
ऐसे चुपचाप ही मर जाते हैं
कुछ लोग यहाँ
उनको दफ़नाने की ज़हमत भी उठानी नहीं पड़ती

ख्वाब

देखो
आहिस्ता चलो
और भी आहिस्ता
ज़रा देखना
सोच सँभल कर
ज़रा पाँव रखना
ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं
कांच के ख़्वाब हैं
बिखरे हुए तन्हाई में
ख़्वाब टूटे न
कोई जाग न जाए देखो
जाग जाएगा कोई
ख़्वाब तो मर जाएगा

सांसों का कैदी

शहतूत की शाख़ पे बैठा कोई
बुनता है रेशम के तागे
लम्हा-लम्हा खोल रहा है
पत्ता-पत्ता बीन रहा है
एक-एक सांस बजा कर सुनता है सौदाई
एक-एक सांस को खोल के अपने तन पर लिपटाता जाता है
अपनी ही साँसों का क़ैदी
रेशम का यह शायर इक दिन
अपने ही तागों में घुट कर मर जाएगा

एक दिन

मैं उड़ते हुए पंछियों को डराता हुआ
कुचलता हुआ घास की कलगियाँ
गिराता हुआ गर्दनें इन दरख़्तों की
छुपता हुआ जिनके पीछे से
निकला चला जा रहा था वह सूरज
त'आक़ुब में था उसके मैं
गिरफ़्तार करने गया था उसे
जो ले के मेरी उम्र का एक दिन
भागता जा रहा था

तेरा कान्धा

चार तिनके उठा के जंगल से
एक बाली अनाज की लेकर
चंद कतरे बिलखते अश्कों के
चंद फांके बुझे हुए लब पर
मुट्ठी भर अपने कब्र की मिटटी
मुट्ठी भर आरजुओं का गारा
एक तामीर की लिए हसरत
तेरा खानाबदोश बेचारा
शहर में दर-ब-दर भटकता है
तेरा कांधा मिले तो टेकूं

खाली डिब्बा

खाली डिब्बा है फ़क़त
खोला हुआ चीरा हुआ
यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ
टकराता हुआ
बेवजह सड़कों पे बिखरा हुआ
फैलाया हुआ
ठोकरें खाता हुआ
खाली लुढ़कता डिब्बा
यूँ भी होता है
कोई खाली-सा
बेकार-सा दिन
ऐसा बेरंग-सा
बेमानी सा
बेनाम सा दिन

Saturday, 14 September 2013

वो जो शायर था

वो जो शायर था चुप-सा रहता था

बहकी-बहकी-सी बातें करता था

आँखें कानों पे रख के सुनता था

गूँगी खामोशियों की आवाज़ें

जमा करता था चाँद के साए

और गीली- सी नूर की बूँदें

रूखे-रूखे- से रात के पत्ते

ओक में भर के खरखराता था

वक़्त के इस घनेरे जंगल में

कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था

हाँ वही,

वो अजीब सा शायर

रात को उठ के कोहनियों के बल

चाँद की ठोड़ी चूमा करता था

चाँद से गिर के मर गया है वो

लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है

Saturday, 22 June 2013

किताबें झाँकती है

किताबें झाँकती है
बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है

महीनों अब मुलाक़ातें नही होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थी

अब अक्सर गुज़र जाती है
कम्प्यूटर के परदे पर
बड़ी बैचेन रहती है किताबें

उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो ग़ज़लें
वो सुनाती थी
कि जिनके शल कभी गिरते नही थे

जो रिश्तें वो सुनाती थी
वो सारे उधड़े-उधड़े है

कोई सफ़्हा पलटता हूँ
तो इक सिसकी निकलती है

कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े है
बिना पत्तों के सूखे टूँड लगते है
वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मानी उगते नही है

जबाँ पर ज़ायका आता था
सफ़्हे पलटने का
अब उँगली क्लिक करने से बस
एक झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है
परदे पर

क़िताबों से जो ज़ाती राब्ता था
वो कट-सा गया है

कभी सीनें पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रहल की सूरत बनाकर
नीम सज़दे में पढ़ा करते थे
छूते थे जंबीं से

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी मगर
वो जो उन क़िताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रूक्के
क़िताबें माँगने,गिरने,उठाने के बहाने
जो रिश्ते बनते थे
अब उनका क्या होगा...

Sunday, 16 June 2013

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

कुछ इक पल के

कुछ दो पल के

कुछ परों से हल्के होते हैं

बरसों के तले

चलते-चलते

भारी-भरकम हो जाते हैं

कुछ भारी-भरकम

बर्फ़ के-से

बरसों के तले

गलते-गलते

हलके-फुलके हो जाते हैं

नाम होते हैं रिश्तों के

कुछ रिश्ते नाम के होते हैं

रिश्ता वह अगर

मर जाये भी

बस नाम से जीना होता है

बस नाम से जीना होता है

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

Saturday, 15 June 2013

बहुत दिन हो गए

मैं
कुछ-कुछ भूलता जाता हूँ अब तुझको,
तेरा चेहरा भी अब धुँधलाने लगा है
अब तखय्युल में,
बदलने लग गया है अब यह सुब-हो-शाम का मामूल,
जिसमें तुझसे मिलने का ही इक मामूल शामिल था तेरे खत आते रहते थे
तो मुझको याद रहते थे तेरी आवाज़ के सुर भी तेरी आवाज़ को कागज़ पे रखके
मैंने चाहा था कि pin कर लूँ,
वो जैसे तितलिओं के पर लगा लेता है कोई
अपनी अलबम में
तेरा 'बे' को दबा कर बात करना,
Wow पर होठों का छल्ला गोल होकर घूम जाता था
बहुत दिन हो गए देखा नहीं,
ना खत मिला कोई
बहुत दिन हो गए सच्ची
तेरी आवाज़ की बौछार में भीगा नहीं हूँ मैं

मेरी दहलीज़ पर

मेरी दहलीज़ पर बैठी हुयी

जानो पे सर रखे

ये शब अफ़सोस करने आई है

कि मेरे घर पे आज ही जो मर गया है दिन

वह दिन हमजाद था उसका

वह आई है

कि मेरे घर में उसको दफ्न कर के,

इक दीया दहलीज़ पे रख कर,

निशानी छोड़ दे कि मह्व है ये कब्र,

इसमें दूसरा आकर नहीं लेटे

मैं शब को कैसे बतलाऊँ,

बहुत से दिन मेरे आँगन में

यूँ आधे अधूरे से कफ़न ओढ़े पड़े हैं

कितने सालों से,

जिन्हें मैं आज तक दफना नही पाया

Friday, 14 June 2013

आखरी फोन

इक सन्नाटा भरा हुआ था,

एक गुब्बारे से कमरे में,

तेरे फोन की घंटी के बजने से पहले.

बासी सा माहौल ये सारा

थोड़ी देर को धड़का था

साँस हिली थी,

नब्ज़ चली थी,

मायूसी की झिल्ली

आँखों से उतरी कुछ लम्हों को

फिर तेरी आवाज़ को,

आखरी बार खुदा हाफिज़ कह के जाते देखा था

इक सन्नाटा भरा हुआ है,

जिस्म के इस गुब्बारे में,

तेरी आखरी फोन के बाद

उलझन

एक पशेमानी रहती है

उलझन और गिरानी भी

आओ

फिर से लड़कर देंखें

शायद

इससे बेहतर कोई और सबब मिल जाए

हमको फिर से अलग हो जाने का

Thursday, 13 June 2013

आँसू

सुना है

मिट्टी पानी का अज़ल से एक रिश्ता है,

जड़ें मिट्टी में लगती हैं,

जड़ों में पानी रहता है.

तुम्हारी आँख से आँसू का गिरना था

कि दिल में दर्द भर आया,

ज़रा से बीज से कोंपल निकलआयी

जड़े मिट्टी में लगती हैं,

जड़ों में पानी रहता है

आईना

मैं
जब भी गुजरा हूँ इस आईने से,

इस आईने ने कुतर लिया कोई हिस्सा मेरा.

इस आईने ने कभी मेरा पूरा अक्स वापस नहीं किया है

छुपा लिया मेरा कोई पहलू,

दिखा दिया कोई ज़ाविया ऐसा,

जिससे मुझको,

मेरा कोई ऐब दिख ना पाए.

मैं खुद को देता रहूँ तसल्ली

कि मुझ सा तो दूसरा नहीं है

ऐ खुदा

बुरा लगा तो होगा ऐ खुदा तुझे,
दुआ में जब,
जम्हाई ले रहा था मैं

दुआ के इस अमल से थक गया हूँ मैं

मैं जब से देख सुन रहा हूँ,
तब से याद है मुझे,
खुदा जला बुझा रहा है रात दिन,
खुदा के हाथ में है सब बुरा भला

दुआ करो
अजीब सा अमल है ये
ये एक फ़र्जी गुफ़्तगू,
और एकतरफ़ा

एक ऐसे शख्स से,
ख़याल जिसकी शक्ल है
ख़याल ही सबूत है.

मैं यहाँ तन्हा हूँ

रात में
जब भी मेरी आँख खुले
नंगे पाँव ही निकल जाता हूँ
कहकशाँ छू के निकलती है जो इक पगडंडी
अपने पिछवाड़े के सन्तुरी सितारे की तरफ़
दूधिया तारों पे पाँव रखता चलता रहता हूँ
यही सोच के मैं कोई सय्यारा अगर जागता मिलजाए कहीं
इक पड़ोसी की तरह पास बुला ले शायद
और कहे
आज की रात यहीं रह जाओ
तुम जमीं पर हो अकेले
मैं यहाँ तन्हा हूँ.

Wednesday, 12 June 2013

अल्फाज

अल्फाज

जो उगते,मुरझाते,जलते,बुझते रहते हैं मेरे चारों तरफ,

अल्फाज़

जो मेरे गिर्द पतंगों की सूरत उड़ते रहते हैं

रात और दिन इन लफ़्ज़ों के किरदार हैं,

इनकी शक्लें हैं,

रंग रूप भी हैं

और उम्रें भी

कुछ लफ्ज़ बहुत बीमार हैं,

अब चल सकते नहीं,

कुछ लफ्ज़ तो बिस्तरेमर्ग पे हैं,

कुछ लफ्ज़ हैं जिनको चोटें लगती रहती हैं,

मैं पट्टियाँ करता रहता हूँ

अल्फाज़ कई,

हर चार तरफ बस यू हीं थूकते रहते हैं,

गाली की तरह

मतलब भी नहीं,

मकसद भी नहीं

कुछ लफ्ज़ हैं

मुँह में रखे हुए चुइंगगम की तरह

हम जिनकी जुगाली करते हैं

लफ़्ज़ों के दाँत नहीं होते

पर काटते हैं

और काट लें तो फिर उनके जख्म नहीं भरते

हर रोज मदरसों में teacher आते है

गालें भर भर के,

छः छः घंटे अल्फाज लुटाते रहते हैं,

बरसों के घिसे,बेरंग से,बेआहंग से,फीके लफ्ज़

कि जिनमे रस भी नहीं,
मानि भी नहीं

एक भीगा हुआ,
छ्ल्का छल्का,
वह लफ्ज़ भी है,
जब दर्द छुए तो आँखों में भर आता है
कहने के लिये लब हिलते नहीं,
आँखों से अदा हो जाता है

बस एक लम्हे का झगड़ा था

बस

एक लम्हे का झगड़ा था

दर-ओ-दीवार पे ऐसे छनाके से गिरी आवाज़

जैसे काँच गिरता है

हर एक शय में गई उड़ती हुई

चलती हुई

किरचें नज़र में

बात में

लहजे में

सोच और साँस के अन्दर

लहू होना था इक रिश्ते का

सो वो हो गया उस दिन

उसी आवाज़ के टुकड़े उठा के फर्श से

उस शब किसी ने काट ली नब्जें

न की आवाज़ तक कुछ भी

कि कोई जाग न जाए

बस एक लम्हे का झगड़ा था

चलो ना भटके

चलो ना
भटके लफ़ंगे कूचों में
लुच्ची गलियों के चौक देखें
सुना है
वो लोग चूस कर जिन को वक़्त ने रास्तें में फेंका था
सब यहीं आके बस गये हैं
ये छिलके हैं ज़िन्दगी के
इन का अर्क निकालो
कि ज़हर इन का तुम्हारे जिस्मों में ज़हर पलते हैं और
जितने वो मार देगा
चलो ना भटके लफ़ंगे कूचों में

बोस्की

नाराज़ है मुझसे
बोस्की शायद

जिस्म का एक अंग चुप चुप सा है

सूजे से लगते है पांव

सोच में एक भंवर की आँख है

घूम घूम कर देख रही है बोस्की

सूरज का टुकड़ा है मेरे खून में

रात और दिन घुलता रहता है

वह क्या जाने,

जब वो रूठे

मेरी रगों में खून की गर्दिश मद्धम पड़ने लगती है.