Friday, 15 December 2017

पुस्तक

एक बार सोचा पुस्तक ने
टीचर से भी कुट्टी हो
रोज़ हमें पढ़ते हैं बच्चे
अपनी भी तो छुट्टी हो

शब्दों ने भी साथ दिया
अब बोले सारे दौड़ चलो
पुस्तक वुस्तक पाठ वाठ से
रिश्ते सारे तोड़ चलो

नल से पानी बहते बहते
नाला हुआ है नाली का
रोज यही कहती है टीचर
नल पर जा, जा पानी ला

पिछली डेस्क पर बैठे बैठे
बच्चे सारे सोते हैं
टीचर कहती ही रहती है
पेड़ पर कितने तोते हैं

फाड़े, फेंके जब कोई पुस्तक
आवाज़ तो करती है
ले जाएगा खोमचे वाला
बस इस बात से डरती है

कपड़े भी फटते हैं सबके
जूते भी घिस जाते हैं
बोल बोल के शब्द भी आखिर
दांतों में पिस जाते हैं

ठीक ही सोचा पुस्तक ने
टीचर से भी तो कुट्टी हो
रोज़ ही पढ़ते हैं बच्चे
इनकी भी तो छुट्टी हो

Friday, 1 December 2017

छोटे कद


तुम लोगो के कद क्यों छोटे रह जाते हैँ?

आओ हाथ पकड़ लो मेरा
पसलियों पे पांव रखो
ऊपर आ जाओ
आओ ठीक से चेहरा तो देखूँ तुम्हारा
कैसे लगते हो

जैसे मेरी अलग अलग चींटियों को तुम पहचान नहीं सकते
वैसे ही मुझको तुम सब एक से लगते हो
बस एक ही फर्क है
मेरी कोई चींटी बदन पे चढ़ जाये तो चुटकी से पकड़ कर मार दिया करते हो तुम
मैं ऐसा नही करता

कह देते हो कहने को तुम
लेकिन अपने बड़ों की इज्जत नहीं करते
इसलिए इतने छोटे रह जाते हो तुम

इतना अकेला नही हूँ मैं तुम जितना समझते हो
तुम ही लोग हो भीड़ में रहकर भी तन्हा रहते हो

भरे हुए काफिले जब बादलों के जाते हैं
झप्पियां डाल के जाते हैं मुझे
दरिया भी उतरते है तो पांव छू के विदा होते हैं

मौसम मेरे मेहमाँ हैं
आते हैं तो महीनों रह के जाते हैं

देखता हूँ कितनी छोटी उम्रों में तुम मिलते बिछड़ते हो ख्वाहिशें और उम्मीदे भी छोटी छोटी

इसलिए क्या तुम्हारे कद इतने छोटे रह जाते हैं?

क्या क्या चलता है

आदमी के पाँव दो हैं तो पाँव पाँव चलता है
पंछी भी तो कभी कभी छाँव छाँव चलता है

चलने वाले कैसे कैसे देखो किस तरहा चले
पैर हैं ना पंख हैं, फिर भी भी ये हवा चले

अपने आप चलते चलते मेज़ पर से गिर पड़ी
अम्मा ने बताया कल भी चल रही थी घड़ी

छुटकी ऊपर से चिल्लाई, भइया फोन फिर से चल पड़ा
हमने समझा छोटू नंगे पाँव धूप में निकल पड़ा

गुंडों की लड़ाई में तो हाँकियाँ भी चलती हैं
कहते है लोग बाग, कभी कभी चालाकियां भी चलती हैं

ठांय ठांय करती सनसनाती गोलियां चली
बिन सड़क की बस्तियों में कितनी बोलियां चलीं

हिलती डुलती भी नही मगर दुकान चलती है
मुँह में है बंधी हुई फिर भी जबान चलती है

गर्मी सर्दी आँधी पानी एक जैसा चलता है
रात हो या दिन कहते है सभी कि पैसा चलता है

दाएँ बाएँ हर तरफ रिवाज चलते रहते हैं
बैठे बैठे भी तो काम काज चलते रहते हैं

Wednesday, 22 November 2017

एक शरीर में कितने दो हैं

एक शरीर में कितने दो हैं?
गिन के देखो कितने वो हैं?

देखने वाली आँखें दो हैं
उनके ऊपर भौहें दो हैं

सूंघते हैं खुशबू जिनसे
नाक तो इक है, नथुने दो हैं

भाषाएँ हैं सैकड़ों लेकिन
बोलने वाले होंठ तो दो हैं

लाखों आवाज़ें हैं सुनते जिनसे
सुनने वाले कान तो दो हैं

कान भी दो, आंखें भी दो
दाएं बाएं कंधे भी दो हैं

दो बांहें, दो कुहनियां उनकी
हाथ भी दो, अंगूठे भी तो दो हैं

दो हाथों की दो हैं कलाइयाँ
टाँगे दो हैं, घुटने दो हैं

चलना, फिरना, उठना, बैठना
दो पैरों के टखने दो हैं

पैरों के नीचे दो तलवे हैं
भागूं जिनसे एड़ियाँ दो हैं

बंद हो तो मुट्ठी हो जाये
खोलू गर हथेलियाँ दो हैं

अरे, भूल गया था, मार तमाचा
मेरे मुंह पे गाल भी दो हैं

दोनों पहलू झांक के देखो
झांकने के भी बगलें दो हैं

कितने दो हैं फिर भी
इक ही दिल है
इक ही जाँ है
एक ही आकाश
एक ही सूरज
इक जमीं
औ इक हिन्दुस्तां है

Wednesday, 8 February 2017

कुछ

कुछ हँस के बोल दिया करो,
कुछ हँस के टाल दिया करो,

यूँ तो बहुत परेशानियां है
तुमको भी मुझको भी,
मगर कुछ फैंसले
वक्त पे डाल दिया करो,
न जाने कल कोई
हंसाने वाला मिले न मिले..

इसलिये आज ही
हसरत निकाल लिया करो !!
समझौता करना सीखिए..
क्योंकि थोड़ा सा झुक जाना
किसी रिश्ते को हमेशा के लिए
तोड़ देने से बहुत बेहतर है ।

किसी के साथ हँसते-हँसते
उतने ही हक से रूठना भी आना चाहिए !
अपनो की आँख का पानी धीरे से
पोंछना आना चाहिए !
रिश्तेदारी और दोस्ती में
कैसा मान अपमान ? बस अपनों के
दिल मे रहना
आना चाहिए…

औरतें

लोग सच कहते हैं -
औरतें बेहद अजीब होतीं है

रात भर पूरा सोती नहीं
थोड़ा थोड़ा जागती रहतीं है
नींद की स्याही में
उंगलियां डुबो कर
दिन की बही लिखतीं
टटोलती रहतीं है
दरवाजों की कुंडियां
बच्चों की चादर
पति का मन..
और जब जागती हैं सुबह
तो पूरा नहीं जागती
नींद में ही भागतीं है

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं

हवा की तरह घूमतीं, कभी घर में, कभी बाहर...
टिफिन में रोज़ नयी रखतीं कविताएँ
गमलों में रोज बो देती आशाऐं

पुराने अजीब से गाने गुनगुनातीं
और चल देतीं फिर
एक नये दिन के मुकाबिल
पहन कर फिर वही सीमायें
खुद से दूर हो कर भी
सब के करीब होतीं हैं

औरतें सच में, बेहद अजीब होतीं हैं

कभी कोई ख्वाब पूरा नहीं देखतीं
बीच में ही छोड़ कर देखने लगतीं हैं
चुल्हे पे चढ़ा दूध...

कभी कोई काम पूरा नहीं करतीं
बीच में ही छोड़ कर ढूँढने लगतीं हैं
बच्चों के मोजे, पेन्सिल, किताब
बचपन में खोई गुडिया,
जवानी में खोए पलाश,

मायके में छूट गयी स्टापू की गोटी,
छिपन-छिपाई के ठिकाने
वो छोटी बहन छिप के कहीं रोती...

सहेलियों से लिए-दिये..
या चुकाए गए हिसाब
बच्चों के मोजे, पेन्सिल किताब

खोलती बंद करती खिड़कियाँ
क्या कर रही हो?
सो गयी क्या ?
खाती रहती झिड़कियाँ

न शौक से जीती हैं ,
न ठीक से मरती हैं
सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

कितनी बार देखी है...
मेकअप लगाये,
चेहरे के नील छिपाए
वो कांस्टेबल लडकी,
वो ब्यूटीशियन,
वो भाभी, वो दीदी...

चप्पल के टूटे स्ट्रैप को
साड़ी के फाल से छिपाती
वो अनुशासन प्रिय टीचर
और कभी दिख ही जाती है
कॉरीडोर में, जल्दी जल्दी चलती,
नाखूनों से सूखा आटा झाड़ते,

सुबह जल्दी में नहाई
अस्पताल मे आई वो लेडी डॉक्टर
दिन अक्सर गुजरता है शहादत में
रात फिर से सलीब होती है...

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं

सूखे मौसम में बारिशों को
याद कर के रोतीं हैं
उम्र भर हथेलियों में
तितलियां संजोतीं हैं

और जब एक दिन
बूंदें सचमुच बरस जातीं हैं
हवाएँ सचमुच गुनगुनाती हैं
फिजाएं सचमुच खिलखिलातीं हैं

तो ये सूखे कपड़ों, अचार, पापड़
बच्चों और सारी दुनिया को
भीगने से बचाने को दौड़ जातीं हैं...

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

खुशी के एक आश्वासन पर
पूरा पूरा जीवन काट देतीं है
अनगिनत खाईयों को
अनगिनत पुलों से पाट देतीं है.

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

ऐसा कोई करता है क्या?
रस्मों के पहाड़ों, जंगलों में
नदी की तरह बहती...
कोंपल की तरह फूटती...

जिन्दगी की आँख से
दिन रात इस तरह
और कोई झरता है क्या?
ऐसा कोई करता है क्या?

सच मे, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं..