Thursday, 31 July 2014

बे-सब्रा

काल माई ने
नीले रंग के,
गोल से इक सय्यारे पर
ये कह के खुदा को छोड़ दिया
बे-सब्रा है ये,
जल्द बड़ा हो जाएगा!!
काल मां चूल्हे पर हांडी रखके,
कब से बैठी है
कच्चे दाने गल जाएं
और एक उबाला आ जाए!
ये बे-सब्रा बच्चा बैठा
ऊंगली रख के गोल कटोरी के अंदर
गोल गोल थाली पर तेज घुमाता है

चीखें

नाखूनों से तराशे
जो खून के धब्बे हैं
खामोश चीखें उनमें कई
कैद पड़ी हैं

Monday, 28 July 2014

मेरा जिस्म

मुझे
मेरा जिस्म छोड़कर
बह गया नदीं में!

अब उस किनारे पहुंच के
मुझको बुला रहा है

मैं इस किनारे पे
डूबता जा रहा पैहम

मैं कैसे तैरूं बगैर उसके!!

मुझे मेरा जिस्म छोड़कर
बह गया नदी में!!

कभी कभी

कभी कभी जब उतरती है
चील शाम की छत से
थकी थकी सी
जरा देर लॉन में रुककर
सफेद और गुलाबी,
मसुंडे’ के पौदों में घुलने लगती है
कि जैसे बर्फ का टुकड़ा
पिघलता जाए व्हिस्की में
मैं ‘स्कार्फ़’ दिन का गले से उतार देता हूं
तेरे उतारे हुए दिन पहन के
अब भी मैं
तेरी महक में कई रोज काट देता हूं!!

उम्मीद

उजड़ गए
तमाम शब जली है शमा हिज्र की..
उम्मीद भी बची है तो बस इतनी
जितनी एक बांझ कोख की उम्मीद हो

भुट्टे

तैने ये भी देखा होगा,
शहर को छापे मारने की आदत है,मेघा
शहर डकैती करे तो बच्चे जेब में भर के ले जाता है
बच्चे बिक जाते हैं जैसे रेहड़ी पर भुट्टे बिकते हैं.

बारिश

बारिश होती है जब
तो इन गारे पत्थर की दीवारों पर
भीगे भीगे नक्शे बनने लगते हैं
हिचकी हिचकी बारिश तब..
पहचानी सी एक लिखाई लिखती है
बारिश कुछ कह जाती है.

मासूम खुदा

एक पहाड़ी के कोने में
बस्ते जितनी बस्ती थी इक
बटवे जितना मंदिर था,
वो भी लॉकिट जितनी
नींद भरी दो बांहों
जैसे मस्जिद के मीनार गले मंदिर के
दो मासूम खुदा सोए थे!
इक बूढ़े झरने के नीचे!

फ़िक्र ना करना

सूरज की इस बैकलाइट में घर के खंडहर...
और दीवारों पर बैठे अफगानी बच्चे,
अमरीका के ‘आर्ट जर्नल’ के कवर पेज पर
अब भी जिंदा लगते हैं!
हल्का हल्का धुआं निकलता रहता है!!
एक टैंक अचानक घर में घुस आया था
जुमेरात के दिन,
थोड़ी-सी,जो भी मिली,
दफना आए हम!
अब ख़ानम की फिक्र न करना अब्बू तुम!!

रन आउट

कितने मासूमों के घर दंगों में जल कर
मलबे का ढेर हुए जाते हैं गुजरात में...
और ये है,
एक टूटे हुए रोज़न में इसे
तिनके सजाने की पड़ी है
बाजू एक जुलाहे का,
हिलता है अब तक
कांप रहा है या शायद कुछ कात रहा है
टांग है एक खिलाड़ी की...
रन आउट हुआ है
घर तक दौड़ते दौड़ते राह में मारा गया

Wednesday, 23 July 2014

धुआँ

बात सुलगी तो बहुत धीरे से थी,
लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे में 'धुआँ' भर गया

चौधरी की मौत सुबह चार बजे हुई थी
सात बजे तक चौधराइन ने रो धो कर होश सम्भाले
और सबसे पहले मुल्ला खैरूद्दीन को बुलाया और नौकर को सख़्त ताकीद की कि कोई ज़िक्र न करे

नौकर जब मुल्ला को आँगन में छोड़ कर चला गय
तो चौधराइन मुल्ला को ऊपर ख़्वाबगाह में ले गई,
जहाँ चौधरी की लाश बिस्तर से उतार कर ज़मीन पर बिछा दी गई थी
दो सफेद चादरों के बीच लेटा एक ज़रदी माइल सफ़ेद चेहरा
सफेद भौंवें,दाढ़ी और लम्बे सफेद बाल
चौधरी का चेहरा बड़ा नूरानी लग रहा था

मुल्ला ने देखते ही 'एन्नल्लाहे व इना अलेहे राजेउन' पढ़ा,
कुछ रसमी से जुमले कहे
अभी ठीक से बैठा भी ना था कि चौधराइन अलमारी से वसीयतनामा निकाल लाई,
मुल्ला को दिखाया और पढ़ाया भी

चौधरी की आख़िरी खुवाहिश थी कि उन्हें दफ़न के बजाय चिता पर रख के जलाया जाय और उनकी राख को गाँव की नदी में बहा दिया जाए,
जो उनकी ज़मीन सींचती है

मुल्ला पढ़ के चुप रहा
चौधरी ने दीन मज़हब के लिए बड़े काम किए थे गाँव में
हिन्दु मुसलमान को एक सा दान देते थे
गाँव में कच्ची मस्जिद पक्की करवा दी थी और तो और
हिन्दुओं के शमशान की इमारत भी पक्की करवाई थी

अब कई वर्षों से बीमार पड़े थे,
लेकिन इस बीमारी के दौरान भी हर रमज़ान में गरीब गुरबा की अफ़गरी (अफ़तारी) का इन्तज़ाम मस्जिद में उन्हीं की तरफ़ से हुआ करता था

इलाके के मुसलमान बड़े भक्त थे उनके,
बड़ा अकीदा था उन पर और अब वसीयत पढ़ के बड़ी हैरत हुई मुल्ला को कहीं झमेला ना खड़ा हो जाय
आज कल वैसे ही मुल्क की फिज़ा खराब हो रही थी,
हिन्दू कुछ ज़्यादा ही हिन्दू हो गए थे, मुसलमान कुछ ज़्यादा मुसलमान

चौधराइन ने कहा,
मैं कोई पाठ पूजा नहीं करवाना चाहती
बस इतना चाहती हूँ
कि शमशान में उन्हें जलाने का इन्तज़ाम कर दीजिए
मैं रामचन्द्र पंडित को भी बता सकती थी, लेकिन इस लिए नहीं बुलाया कि बात कहीं बिगड़ न जाए

बात बताने ही से बिगड़ गई जब मुल्ला खैरूद्दीन ने मसलेहतन पंडित रामचंन्द्र को बुला कर समझाया कि
तुम चौधरी को अपने शमशान में जलाने की इज़ाज़त ना देना वरना हो सकता है,
इलाके के मुसलमान बावेला खड़ा कर दें
आखिर चौधरी आम आदमी तो था नहीं,
बहुत से लोग बहुत तरह से उन से जुड़े हुए हैं
पंडित रामचंद्र ने भी यकीन दिलाया कि वह किसी तरह की शर अंगेज़ी अपने इलाके में नहीं चाहते
इस से पहले बात फैले,
वह भी अपनी तरफ़ के मखसूस लोगों को समझा देंगे

बात जो सुलग गई थी धीरे धीरे आग पकड़ने लगी
सवाल चौधरी और चौधराइन का नहीं हैं, सवाल अकीदों का है
सारी कौम,सारी कम्युनिटि और मज़हब का है

चौधराइन की हिम्मत कैसे हुई कि वह अपने शौहर को दफ़न करने की बजाय जलाने पर तैयार हो गई
वह क्या इसलाम के आईन नहीं जानती?
कुछ लोगों ने चौधराइन से मिलने की भी ज़िद की

चौधराइन ने बड़े धीरज से कहा
भाइयों
ऐसी उनकी आख़री ख्व़ाहिश थी
मिट्टी ही तो है,
अब जला दो या दफन कर दो,
जलाने से उनकी रूह को तसकीन मिले तो आपको एतराज़ हो सकता है?
एक साहब कुछ ज़्यादा तैश में आ गए
बोले,उन्हें जलाकर क्या आप को तसकीन होगी?
जी हाँ चौधराइन का जवाब बहुत मुख्तसर था
उनकी आख़री ख़्वाहिश पूरी करने से ही मुझे तसकीन होगी
दिन चढ़ते चढ़ते चौधराइन की बेचैनी बढ़ने लगी

जिस बात को वह सुलह सफाई से निपटना चाहती थी वह तूल पकड़ने लगी
चौधरी साहब की इस ख़्वाहिश के पीछे कोई पेचीदा प्लाट,कहानी या राज़ की बात नहीं थी
ना ही कोई ऐसा फलसफ़ा था जो किसी दीन मज़हब या अकीदे से ज़ुड़ता हो
एक सीधी सादी इन्सानी ख्व़ाहिश थी कि मरने के बाद मेरा कोई नाम व निशान ना रहे
जब हूँ तो हूँ,जब नहीं हूँ तो कहीं नहीं हूँ

बरसों पहले यह बात बीवी से हुई थी,
पर जीते जी कहाँ कोई ऐसी तफ़सील में झाँक कर देखता है
और यह बात उस ख़्वाहिश को पूरा करना चौधराइन की मुहब्बत और भरोसे का सुबूत था
यह क्या कि आदमी आँख से ओझल हुआ और आप तमाम ओहदो पैमान भूल गए

चौधराइन ने एक बार बीरू को भेजकर रामचंद्र पंडित को बुलाने की कोशिश भी की थी लेकिन पंडित मिला ही नहीं

उसके चौकीदार ने कहा
देखो भई,
हम जलाने से पहले मंत्र पढ़के चौधरी को तिलक जरूर लगाएँगे

अरे भई जो मर चुका उसका धर्म अब कैसे बदलेगा?
तुम ज़्यादा बहस तो करो नहीं
यह हो नहीं सकता कि गीता के श्लोक पढ़े बगैर हम किसी को मुख अग्नि दें
ऐसा ना करें तो आत्मा हम सब को सताएगी, तुम्हें भी,
हमें भी
चौधरी साहब के हम पर बहुत एहसान हैं
हम उनकी आत्मा के साथ ऐसा नहीं कर सकते

बीरू लौट गया
बीरू जब पंडित के घर से निकल रहा था तो पन्ना ने देख लिया
पन्ना ने जाकर मस्जिद में ख़बर कर दी

आग जो घुट घुट कर ठंडी होने लगी थी,
फिर से भड़क उठी
चार पाँच मुअतबिर मुसलमानों ने तो अपना कतई फैसला भी सुना दिया

उन पर चौधरी के बहुत एहसान थे वह उनकी रूह को भटकने नहीं देंगे
मस्जिद के पिछवाड़े वाले कब्रिस्तान में
कब्र खोदने का हुक्म भी दे दिया

शाम होते होते कुछ लोग फिर हवेली पर आ धमके
उन्होंने फ़ैसला कर लिया था कि चौधराइन को डरा धमका कर,
चौधरी का वसीयतनामा उससे हासिल कर लिया जाय और जला दिया जाय फिर वसीयतनामा ही नहीं रहेगा तो बुढ़िया क्या कर लेगी

चौधराइन ने शायद यह बात सूँध ली थी वसीयतनामा तो उसने कहीं छुपा दिया था और जब लोगों ने डराने धमकाने की कोशिश की तो उसने कह दिया,
मुल्ला खैरूद्दीन से पूछ लो,उसने वसीयत देखी है और पूरी पढ़ी है

और अगर वह इन्कार कर दे तो?

कुरआन शरीफ़ पर हाथ रख के इन्कार कर दे तो दिखा दूँगी, वरना...

वरना क्या?

वरना कचहरी में देखना

बात कचहरी तक जा सकती है,यह भी वाज़े हो गया
हो सकता है चौधराइन शहर से अपने वकील को और पुलिस को बुला ले
पुलिस को बुला कर उनकी हाज़री में अपने इरादे पर अमल कर ले
और क्या पता वह अब तक उन्हें बुला भी चुकीं हों
वरना शौहर की लाश बर्फ़ की सिलों पर रखकर कोई कैसे इतनी खुद एतमादी से बात कर सकता है

रात के वक्त ख़बरे अफ़वाहों की रफ्तारसे उड़ती है
किसी ने कहा,
एक घोडा सवार अभी अभी शहर की तरफ़ जाते हुए देखा गया है
घुड़सवार ने सर और मुँह साफे से ढांप रखा था,और वह चौधरी की हवेली से ही आ रहा था

एक ने तो उसे चौधरी के अस्तबल से निकलते हुए भी देखा था
ख़ादू का कहना था कि उसने हवेली के पिछले अहाते में सिर्फ़ लकड़ियाँ काटने की आवाज़ ही नहीं सुनी,
बल्कि पेड़ गिरते हुए भी देखा है
चौधराइन यकीनन पिछले अहाते में
चिता लगवाने का इन्तज़ाम कर रही हैं

कल्लू का खून खौल उठा
बुजदिलों,आज रात एक मुसलमान को चिता पर जलाया जाएगा और तुम सब यहाँ बैठे आगकी लपटें देखोगे
कल्लू अपने अड्डे से बाहर निकला
खून खराबा उसका पेशा है तो क्या हुआ? ईमान भी तो कोई चीज़ है
ईमान से अज़ीज तो माँ भी नहीं होती यारों

चार पाँच साथियों को लेकर कल्लू पिछली दीवार से हवेली पर चढ़ गया
बुढ़िया अकेली बैठी थी,लाश के पास
चौंकने से पहले ही कल्लू की कुल्हाड़ी सर से गुज़र गई

चौधरी की लाश को उठवाया और मस्जिद के पिछवाड़े ले गए
जहाँ उसकी कब्र तैयार थी

जाते जाते रमजे ने पूछा
सुबह चौधराइन की लाश मिलेगी तो क्या होगा?

बुढ़िया मर गई क्या?

सर तो फट गया था,सुबह तक क्या बचेगी?

कल्लू रुका और देखा चौधराइन की ख़्वाबगाह की तरफ़

पन्ना कल्लू के 'जिगरे' की बात समझ गया

तू चल उस्ताद,तेरा जिगरा क्या सोच रहा है मैं जानता हूँ
सब इन्तज़ाम हो जाएगा

कल्लू निकल गया,
कब्रिस्तान की तरफ़

रात जब चौधरी की ख्व़ाबगाह से आसमान छुती लपटें निकल रही थी तो सारा कस्बा धुएँ से भरा हुआ था

ज़िन्दा जला दिए गए थे
और मुर्दे दफ़न हो चुके थे

सरहद पर

सुबह सुबह इक ख्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला
देखा
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं
आंखों से मानूस थे सारे
चेहरे सारे सुने सुनाये
पाँव धोया
हाथ धुलाये
आँगन में आसन लगवाये
और तंदूर पे मक्की के कुछ
मोटे मोटे रोट पकाए

पोटली में मेहमान मेंरे
पिछले सालों की फसलों का गुड लाये थे

आँख खुली तो देखा
घर में कोई नहीं था
हाथ लगाकर देखा तो तंदूर अभी तक बुझा नहीं था

और हाथों पर मीठे गुड का जायका अब तक चिपक रहा था

ख्वाब थाशायद
ख्वाब ही होगा

सरहद पर कल रात सुना है चली थी गोली

सरहद पर कल रात सुना है
कुछ ख़्वाबों का खून हुआ है

उर्दू

ये कैसा इश्क है उर्दू ज़बां का
मज़ा घुलता है लफ्जों का ज़बां पर
कि जैसे पान में महंगा क़माम घुलता है
नशा आता है उर्दू बोलने में
गिलोरी की तरह हैं मुंह लगी सब इस्तिलाहें
लुत्फ़ देती हैं.
हलक़ छूती है उर्दू तो
हलक़ से जैसे मय का घूँट उतरता है

बड़ी एरिस्टोक्रेसी है ज़बां में
फकीरी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दू

अगरचे मानी कम होते हैं और अल्फाज़ की
इफरात होती है
मगर फिर भी
बलंद आवाज़ पढिये तो
बहोत ही मोतबर लगती हैं बातें

कहीं कुछ दूर से कानों में पड़ती है अगर उर्दू
तो लगता है
कि दिन जाडों के हैं
खिड़की खुली है
धूप अन्दर आ रही है

अजब है ये ज़बां उर्दू
कभी यूँ ही सफर करते
अगर कोई मुसाफिर शेर पढ़ दे मीर ओ गालिब का
वो चाहे अजनबी हो
यही लगता है वो मेरे वतन का है

बड़े शाइस्ता लह्जे में किसी से उर्दू सुनकर
क्या नहीं लगता
कि इक तहजीब की आवाज़ है उर्दू

राह

ये राह बहुत आसान नहीं
जिस राह पे हाथ छुड़ाकर तुम यूँ तनहा चल निकली हो
इस खौफ़ से शायद राह भटक जाओ न कहीं
हर मोड़ पे मैंने नज़्म खड़ी कर रखी है

थक जाओ अगर
और तुमको ज़रूरत पड़ जाये
इक नज़्म की उँगली थाम के वापस आ जाना

दर्द

दर्द कुछ देर ही रहता है
बहुत देर नहीं
ख़त्म हो जाएगी जब इसकी रसद
टिमटिमायेगा ज़रा देर को बुझते बुझते
और फिर लम्बी सी इक साँस धुँए की लेकर
ख़त्म हो जायेगा .....
ये दर्द भी बुझ जायेगा

रेप मार्किट 4


सात सालों में छह औलादों ने निचोड़ के रख दिया जमीला को.
और ज़हूर मियां की शहवत किसी तरह कम न हुई थी...
इत्ती भी शर्म न करते थे.

अल्लाह मियां की बरकत है.
वो दे तो हम ना कहने वाले कौन?

दोस्त-यार आस-पड़ोस वाले ताने देते थे
बस करो मियां तुमने तो मशीन लगा रखी है. अरे इस बेचारी का भी ख्याल करो...!

बड़ी शैतानी नज़र आती उनकी हंसी में
जब कहते,
कोई बात नहीं,थक जाएगी तो दूसरी ले आएंगे.
बस इसी बात से डरती थी जमीला!
कहीं किसी दिन ये मसखरी सच न साबित हो जाए.

पुरानी सी बस्ती में पुराने दिनों के किरायेदार थे. तीन मंजिला बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर
तीन कमरों का घर था...
और नौ जने रहते थे.
छह औलादें,
एक जमीला की बूढ़ी मां और दो वो खुद मियां बीवी!

ज़हूर मियां जिस्म के तगड़े थे,
और मेहनतकश भी.
सारा दिन हाथगाड़ी में सामान ढोते थे.
दूकान से गोदाम तक और गोदाम से दूकान तक. सेठ खुश था.
अच्छा खासा कमा लेते थे.
बच्चों के कपड़े लत्ते के लिए तो थान के थान ही ले आया करते थे.

गली में खेलते अपने बच्चों को उनके कपड़ों ही से पहचान लेते थे.
नाम याद थे.
उंगलियों पर गिन सकते थे.
उन्हें देख के नाम नहीं बता सकते थे.
सब एक ही फैक्ट्री से निकले लगते थे.
और जमीला से कह भी रखा था,
एक वक्त में एक ही थान के कपड़े पहनाया करो. वरना कोई भी लौंडा साला अब्बा अब्बा कह के जेब में हाथ डालता है और पैसे ले जाता है.

अम्मी के मना करने पर भी उनके लिए महीने दो महीने में कोई न कोई जोड़ा ले आया करते थे. और जमीला के लिए तो हमेशा इफरात ही रही. किसी तरह की कमी न होने दी.
बहुत मुहब्बत करते थे बीवी से.
इस मुहब्बत ही का नतीजा था
कि सात सालों में छह औलादें पैदाकर दीं.

मर्दों की निस्बत औरतें आपस में ज्यादा बेबाकी से बात कर लेती हैं.
जमीला को भी आस पड़ोस वालियां समझाती थीं, बीवी,
उसकी नसबंदी कराओ या अपनी कोख निकलवा दो.
वो तो बाज़ नहीं आने वाले.
पिंड छुड़ाना भी तो सीखो.
दूसरी लाना है तो ले आए.
कुछ दिन उसे भी ये पेट गाड़ी खींचने दो.
औरतें हंस देतीं.
लेकिन जमीला का मुंह सूख जाता.

एक ने भली राय दी,
बच्चों में सोया करो.
पास आए तो चुटकी काट के जगा दिया करो. अपने आप झाग बैठ जाएगी...
और फुसफुसा के हंस दी.
जमीला से कुछ भी न हुआ.

उस रोज जब वो देर तक नहीं आया तो अम्मा को शक हो गया.
वो लक्षण समझती थी.
इशारे से बेटी को तंबिह कर दी.
दोस्तों यारों में कहीं पीने पिलाने बैठ गया होगा.
तू बच्चों में जाकर सो जाना.

और भूखे लौटे तो?

भूखा तो आएगा,पर तुझे खाएगा आ के.
उल्टा तेरा पेट भर देगा.

जमीला समझ तो गई पर मां के सामने ये कह के अंदर चली गई
खाना भर के रख देती हूं चूल्हे के पास.
गर्म रहेगा.

और वही हुआ.
ज़हूर मियां किमाम भरा पान चबाते हुए घर में दाखिल हुए.
हलकी-सी लग़जिश थी कदमों में.
जूते उतार के दबे पांव कमरे में दाखिल हुए तो जमीला को दो बच्चों के बीच सोता पाया.
गला दबा के आवाज़ दी
जमीला...

वो हिली नहीं.
ज़हूर मियां ने एक बगल के बच्चे को उठा कर पलंग वाले बच्चों में डाल दिया
और जमीला के पास आकर लेट गए.
मुंह अपनी तरफ किया तो वो उठ के बैठ गई.

क्या करते हो?...
खाना रखा है जा के खालो ना.
वो इतने ज़ोर से बोली थी कि ज़हूर मियां ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया.

आहिस्ता बोलो
बच्चे जाग जाएंगे.
अम्मा पहले ही से जाग रही थी.
एक बार जी चाहा कि उठकर चली जाए कमरे में और कह दे कि बेमौत मत मार जमीला को.

लेकिन उसे याद था कि एक बार नसीहतन कुछ कहा था तो ज़हूर मियां ने मुंहतोड़ सुना दी थी,

बीच में मत बोला करो अम्मां.
भूलो मत तुमने ग्यारह औलादें जनी थीं
और ये नवीं थी
जमीला!

अम्मां बिस्तर पे उठ के बैठ गई.
कुछ देर तक सरगोशियों की आवाज़ें आती रहीं और फिर एक थप्पड़ की आवाज आई.

डरते डरते अम्मां उठके दरवाज़े तक गई तो देखा ज़हूर मियां जमीला के मुंह में कपड़ा ठूंसे उसे सीढियों से छतकी तरफ घसीटता हुआ ले जा रहा था.

रेप मार्किट 3


मैडम-मैडम...मेम साहब!
इफ़ती ने उचक उचक के उस जर्मन लड़की को अपनी तरफ़ रागिब कर लिया.
वो होटल से निकली ही थी,
इफ़ती फ़ौरन अपनी टैक्सी घुमा के पहुंच गया.

इफ़टी!
मुस्करा के वो लड़की टैक्सी में घुस गई,
और गर्दन उसके कान के पास लाकर बोली,
आई वांट टु वेयर बेंगल्ज़.

व्हाट? व्हाट?
इफ़ती को थोड़े ही से अंगेरज़ी के लफ़्ज़ आते थे. वो भी उसने इसी होटल से टूरिस्ट पकड़ पकड़ के सीख लिए थे.
उस जर्मन लड़की ने अपनी बांहें दिखा कर समझाया,

चूडियां! वो चूडियां पहनना चाहती थी.
इफ़ती ख़ुश हो गया.
कोलाबा से भिंडी बाज़ार!
अच्छा भाड़ा बनेगा और तक़रीबन आधे दिन की सवारी तो पक्की हुई.

यस-यस...यस-यस.
उसके बाद पता नहीं वो गोरी कलाइयां घुमा के क्या क्या कहती रही.
साइज़ की बात कर रही थी या रंग की
लेकिन वो यस यस! ही कहता रहा.

फ़ार!...वैरीफ़ार... !
उसने बांह झुला कर उंगलियों से तर्जुमा कर दिया. लड़की की मुस्कराहट और गर्दन ने रज़ामंदी दे दी. कई जगह पर वो इशारों से कुछ कुछ पूछ लेती थी,
और अगर यस नो से काम नहीं चलता तो वो किसी भी बिल्डिंग की तरफ़ इशारा करके नाम ले देता.
हाईकोर्ट...हाईकोर्ट...ब्लैक हॉर्स... काला घोड़ा...काला घोड़ा वैरी फ़ेमस!
मशहूर है! बहुत!
कहते हुए हाथ सर से ऊपर तक उठा देता.

एक बात बड़ी ख़राब थी उस लड़की में,
एक तो सिगरेट बहुत पीती थी,
दूसरे हंसती बहुत थी
और बात-बात पर ताली बजाने लगती थी.
गुड गुड!
बस इतना ही समझ आता था उसे.

कभी कभी आगे आकर उसके कंधों पर हाथ रख के जब कुछ पूछती तो होंठ उसके कानों को छू जाते थे.
हटाना मुश्किल हो जाता.

अरे लोग देख रहे हैं यार.
पीछे हट कर बात कर ना.

व्हाट?
वो पूछती.

सिटडाउन...माई व्हील...बैलेंस नहीं रहता यार.
वो स्टैरिंग व्हील दाएं बाएं झुलाकर बताता.

यस...यस...!
वो कहती.

चूडियां पहन कर वो लड़की बहुत खुश हुई.
बार बार उसकी आंखों के सामने बजाती और खिलखिला के हंस पड़ती.

मुश्किल हो गई जब टैक्सी तक जाते जाते उसने इफ़ती की बांह में हाथ डाल लिया था.
सब देख रहे थे.
फुटपाथ पर भीड़ थी,
दूकानें थीं,
और टैक्सी काफ़ी दूर खड़ा करके आना पड़ा था.

उस पर एक और आफ़त आन पड़ी.
एक बुर्कापोश औरत नक़ाब उलटे,
कुछ ख़रीद रही थी,
उसके हाथ पकड़ लिए उसने.

इफ़टी...व्हाट इज़ दिस?...आई वांट दिस.

घबरा के औरत ने हाथ अंदर कर लिए.
और वो उसके हाथ पकड़ के बाहर निकालने की जिद करने लगी.
शो मी...शो मी...प्लीज़.

मैडम...दैट इज़ मेहंदी...मेहंदी...
अब यहां से चलो, मैं लगवा दूंगा.
कम...कम नाव!
अब इफ़ती की बारी थी.
उसे हाथ से,कमर से,बांह से खींच के लाना पड़ा.

सारा रास्ता वो रूठी रही.
उसके बाद इफ़ती का भी मन ही नहीं किया कि टैक्सी निकाले.
होटल के सामने ही गाड़ी लगा के सो गया...
वो भी शाम को बाहर नहीं निकली.
इफ़ती भी कहीं नहीं गया.

अगली सुबह चार या पांच बजे का वक़्त होगा. आसमान अभी खुला नहीं था.
इफ़ती की आंख खुल गई.
वो जर्मन लड़की होटल से निकल रही थी.
वो भी शायद रात भर जागी थी,
या नाचती रही थी.

हमेशा की तरह रात देर तक होटल में बैंड बजता रहा था.
ज़्यादातर फिरंगी रात को पी के नाचते रहते हैं. फिर देर तक सोते हैं.
लेकिन हैलेन पता नहीं क्यों जल्दी उठ गई थी.

उसने ख़ुद ही एक नाम दे दिया था उस जर्मन लड़की को.
गेट पर खड़े हो के हैलेन ने इधर उधर देखा तो इफ़ती ने हाथ हिला दिया.

वो चिल्लाई,
हाये ए...

जब तक इफ़ती टैक्सी स्टार्ट करता
वो आकर सामने की सीट पर उसके साथ ही बैठ गई.

लेट अस गो.

किधर?...व्हैर...?
मेहंदी के लिए बहुत जल्दी है.
उसने घड़ी दिखाई और हथेली का इशारा किया.

ओह नो...सिली!
चलो...मार्निग वाक इन टैक्सी.
फिर वही हंसी और ताली बजा कर बोली.
गेट वे इंडिया... चलो.
बहुत दूर नहीं था.
वो कोलाबा में ही थे.

इफ़ती चल तो दिया लेकिन वो ऐसी सट के बैठी थी उसके साथ
और स्कर्ट भी इतनी पतली कि बार बार नज़र हटानी पड़ती थी.

गेटवे पर इतनी सुबह कोई था नहीं,
लेकिन दो तीन मोटरबोट वाले जाग रहे थे. ऐलीफेंटा की सवारी अक्सर पौ फटे मिल जाती थी.
और अब रात भी हल्की होने लगी थी.

उनलोगों ने इफ़ती को पहुंचते देखा था.
एक ने दूर से आवाज़ भी दी थी
ऐलीफेंटा मैडम?

नहीं नहीं यूंही घूमने आए हैं.
अगला भाग इफ़ती ने जवाब दिया था.

हैलेन उतर के टहलती हुई समंदर के किनारे तक चली गई थी...
और दीवार पे बैठ के सिगरेट जला दिया.
इफ़ती ने झाड़न निकाला और गाड़ी साफ़ करने लगा.

ज़रा देर में मोटरबोट वालों में से एक लड़का टहलता हुआ लड़की के पास से गुज़रा और सिगरेट मांगी.
सिगरेट...मैडम
गिव मी वन सिगरेट.

आफ़कोर्स!
मुस्करा के उसने एक सिगरेट निकाला.

इफ़ती को हैलेन गैर महफूज़ लगी तो वो अपनी गाड़ी से बाहर निकला.
पर उसे दूसरे ने धकेल के वापस बिठा दिया.

बैठ नां श्याने!
तेरा क्या ले रहा है?
एक सिगरेट ही तो मांगा है.
येसब फिरंगी साले गंजेड़ी होते हैं.

लेकिन वो गांजा वांजा कुछ नहीं लेती.

तुझे क्या मालूम?
वो ऐसे खड़ा हो गया था उसके सामने
कि इफ़ती उधर न देख सके.

सफ़ेदा पीते हैं सब.
हशिश कहते हैं ये लोग...
और गोविंदा तो चाल देखकर सूंघ लेता है.

गोविंदा कौन?

वही,जो सिगरेट ले रहा है.
चुटकी में भर देगा.
पीती होगी तो मान जाएगी.
नहीं पीती तो ना सही.
घूमने निकली है ना,
मोटरबोट पे घुमा के ले आएगा.

वो जाएगी तब ना...
कोई ज़बरदस्ती है?

उसने बड़ी सख़्ती से इफ़ती का चेहरा
अपनी उंगलियों में दबाया

ज़बरदस्ती तो तू कर रहा है साले.
शादी बनाने चला है क्या?

इफ़ती ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की.
आंखों से पानी निकल आया.
लेकिन वो ज़्यादा तगड़ा था.

उसी वक़्त गोविंदा की आवाज़ आई
अबे पट गई बे हरी.
चलेगा मोटरबोट में?

हरी ने धक्का दिया उसे
और भाग गया.
इफ़ती खड़ा हुआ तो देखा वो मोटरबोट में जाने के लिए सीढियां उतर रही थी.

वहीं से आवाज़ दी
इफ़टी... वेट फार मी...कमिंग.

गोविंदा ने हाथ पकड़ के उसे मोटरबोट में ले लिया. हरी कूद के दाखिल हो गया,
और फटफटाती हुई मोटरबोट बीच समंदर की तरफ चल दी.

इफ़ती अपनी आंखें पोंछता हुआ देर तक उसकी तरफ देखता रहा.
अंधेरे में मोटरबोट की आवाज़ दूर जा रही थी.