A poem perched on a moment
Imprisoned in a butterfly net
Then its wings cut off
To keep it pinned in an album
If this is not justice, what is?
Entangled in the paper the moments are mummified
Only the colours of the poem remain on my fingertips!
A poem perched on a moment
Imprisoned in a butterfly net
Then its wings cut off
To keep it pinned in an album
If this is not justice, what is?
Entangled in the paper the moments are mummified
Only the colours of the poem remain on my fingertips!
एक ही सूरज है सबके लिए
वही धूप देता है
वही छांव करता है
अगर आप धूप में हैं
तो इन बच्चों पे छांव कीजिये
और अगर छांव में हैं
तो इन पर धूप आने दीजिये
ये विकलांग बच्चे
मोहताज़ नही
ज़रूरतमंद हैं
हमदर्दीे और प्यार के
सूरज की पहली रोशनी
आरुषी यही करती है
मुन्ने ने
माँ को बुला के पूछा
माँ,कहाँ से आया था मैं
और तुमको मिला कहाँ?
अध् रोयी,अध् हँसती माँ
छाती से लगा के बोली थी
इच्छा बन के आये थे
और तुम मेरे मन में थे
तुम मेरे बचपन के गुडिया खेल में थे
जंग का कूड़ा एक जगह पर जमा हुआ है
पहली बार है
इतने सारे बाजू टाँगें हाथ और सर और पांव
ऐसे अलग अलग बिखरे देखे हैं
बचे खुचे पुर्जे लगते हैं
स्पेयर पार्ट्स हैं
बाजू एक जुलाहे का हिलता है अब तक
काँप रहा है या कुछ कात रहा है
टांग है एक खिलाडी की
रन आउट हुआ है
घर तक दौड़ते दौड़ते राह में मारा गया
टूटे फूटे शेर अभी तक सर में खर्र खर्र बजते हैं
उँगलियाँ रेंग रही हैं
कुछ मिटटी में तारीख दर्ज करने की कोशिश लगती है
पुर्जा पुर्जा खोल के एक मैकेनिक ने उनकी मरम्मत चाही थी
बुरा लगा था उसको
ये पुर्जे आवाज़ करते हैं
मुझे खर्ची में पूरा दिन हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है
झपट लेता है अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है
तो गिरने की आहट भी नही होती
खरे दिन को भी मैं खोटा समझ के भूल जाता हूँ
गिरेबाँ से पकड़ के मांगने वाले भी मिलते हैं
तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है
तुझे किश्तें चुकानी हैं
जबरदस्त कोई गिरवी भी रख लेता है
ये कहकर
अभी दो चार लमहे खर्च करने के लिए रख ले
बकाया उमर के खाते में लिख देते हैं
जब होगा,हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन एक बार मैं अपने लिए रख लूँ
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है
बारिश होती है जब
तो इन गाढ़ी पत्थर की दीवारों पर
भीगे भीगे नक़्शे बनने लगते हैं
हिचकी हिचकी बारिश तब
पहचानी सी इक लिखाई लगती है
बारिश कुछ कह जाती है
ऐसे ही अश्कों से भीगे ख़त शायद
तुमने पहले देखा हो
तिलस्मी शहर के मंज़र अजब हैं
अकेले रात को निकलो सियाह साटिन की सड़कों पर
तिलस्मी चेहरे ऊपर जगमगाती होर्डिंग पर झूलते हैं
सितारे झांकते हैं,नीचे सड़कों पर
वहाँ चढ़ने के जीने ढूंढने पड़ते हैं
पातालों में गुम होकर
यहाँ जीना भी जादू है
यहाँ ख्वाब भी टांगो पर चलते हैं
उमंगें फूटती हैं
जिस तरहा पानी में रखे मूँग के दाने चटखते है
तो जुबान उगने लगती है
यहाँ दिल खर्च हो जाते हैं अकसर
कुछ नही बचता
सभी चाटे हुए पत्तल हवा में उड़ते रहते हैं
समंदर रात को जब आंख बंद करता है
ये नगरी
पहन के सारे जेवर आसमा पर अक्स अपना देखा करती है
कभी सिंदबाद भी आया होगा इस ज़ज़ीरे पर
ये आधी पानी आधी ज़मीं पर
जिन्दा मछली देखकर हैरान हुआ होगा
सफ़ेद चील जब थक कर कभी नीचे उतरती है
पहाड़ों को सुनाती है पुरानी दास्तान
पुराने पेड़ो की
वहां देवदार का इक ऊँचे कद का
पेड़ था पहले
वो बादल बांध लेता था
कभी पगड़ी की सूरत अपने पत्तों पर
कभी दुशाले की सूरत उसी को ओढ़ लेता था
हवा की थाम के बह कभी जब झूमता था
उसे कहता था
मेरे पांव अगर जकड़े नही होते
मैं तेरे साथ ही चलता
उधर शीशम था
कीकर से कुछ आगे
बहुत लड़ते थे वो दोनों
मगर सच है कि कीकर उसके ऊँचे कद से जलता था
सुरीली सीटियाँ बजती थी जब शीशम के पत्तों में
परिंदे बैठ के शाखों पे
उसकी नकलें करते थे
वहां इक आम भी था
जिस पर इक कोयल कई बरसों तक आती रही
जब बौर आता था
उधर दो तीन थे जो गुलमोहर
अब तक बाकी है
वो अपने जिस्म पर खोदे हुए नामों को ही सहलाता रहता है
उधर इक नाम था जो चाँदनी से इश्क करता था
नशे में नीली पड़ जाती थी सारी पत्तियां उसकी
जरा और उस तरफ परली पहाड़ी पर
बहुत से झाड़ थे जो लम्बी लम्बी सांसें लेते थे
मगर अब एक भी दिखता नही है
उस पहाड़ी पर कभी देखा नहीं
सुनते हैं
उस वादी के दामन में
बड़े बरगद के घेरे में बड़ी इक चम्पा रहती थी
जहाँ से काट ले कोई
वही से दूध बहता था
कई टुकड़ों में बेचारी गयी थी अपने जंगल से
सफ़ेद चील इक सूखे हुए से पेड़ पर बैठी
पहाड़ों को सुनाती है पुरानी दास्तानें ऊँचे पेड़ो की
जिन्हें इन पस्त कंद इंसान ने काटा है
गिराया है
कई टुकड़े किये हैं और जलाया है
देर तक बैठे हुए दोनों ने बारिश देखी
वो दिखाती थी मुझे बिजली के तारों पे लटकती हुई बूंदें
जो ताकुब में एक दुसरे के
और एक दुसरे को छूते ही तारों से टपक जाती थीं
मुझको ये फ़िकर के
बिजली का करंट छु गया नंगी किसी तार से तो
आग के लग जाने का बायस होगा
उसने कागज़ की कई कश्तियाँ पानी में उतारीं
और ये कह के बहा दीं के
समंदर में मिलेंगे
मुझको ये फिकर के इस बार भी सैलाब का पानी
कूद के उतरेगा कोहसार से जब
तोड़ के ले जायेगा ये कच्चे किनारे
ओक में भर के वो बरसात का पानी
अधभरी झीलों को तरसाती रही
वो बहुत छोटी थी,कमसिन थी
वो मासूम बहुत थी
आबिसारों के तरन्नुम पे कदम रखती थी
और गूंजती थी
और मैं उम्र के इफ़्कार में गुम
तजुर्बे हमराह लिए
साथ ही साथ में बहता हुआ
चलता हुआ
बहता गया
मैं कायनात में ,सय्यारों में भटकता था
धुएँ में धूल में उलझी हुई किरण की तरह
मैं इस जमीं पे भटकता रहा हूँ सदियों तक
गिरा है वक्त से कट कर जो लम्हा
उसकी तरह
वतन मिला तो गली के लिए भटकता रहा
गली में घर का निशाँ तलाश करता रहा बरसों
तुम्हारी रूह में अब ,जिस्म में भटकता हूँ
तुम्हारी कोख से जनमू तो फ़िर पनाह मिले ..
तुम्हारे गम की डली उठा कर
जुबान पर रख ली हैं मैंने
वह कतरा कतरा पिघल रही है
मैं कतरा कतरा ही जी रहा हूँ
पिघल पिघल कर गले से उतरेगी
आखरी बूंद दर्द की जब
मैं साँस की आखरी गिरह को भी खोल दूंगा
मैं जब छांव छांव चला था अपना बदन बचा कर
कि रूह को एक खूबसूरत जिस्म दे दूँ
न कोई सिलवट .न दाग कोई
न धूप झुलसे, न चोट खाएं
न जख्म छुए, न दर्द पहुंचे
बस एक कोरी कंवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ,
रूह को मैं
मगर तपी जब दोपहर दर्दों की,
दर्द की धूप से जो गुजरा
तो रूह को छांव मिल गई है .
अजीब है दर्द और तस्कीं का साँझा रिश्ता
मिलेगी छांव तो बस कहीं धूप में मिलेगी ...
अकबर का लोटा रखा है शीशे की अलमारी में
रना के "चेतक" घोड़े की एक लगाम
जैमल सिंह पर जिस बंदूक से अकबर ने
दाग़ी थी गोलीरखी है !
शिवाजी के हाथ का कब्जा
"त्याग राज" की चौकी, जिस पर बैठ के रोज़
रियाज़ किया करता था वो
"थुन्चन" की लोहे की कलम है
और खड़ाऊँ "तुलसीदास" की
"खिलजी" की पगड़ी का कुल्ला...
जिन में जान थी, उन सब का देहांत हुआ
जो चीज़ें बेजान थीं, अब तक ज़िन्दा हैं !!
कितनी आवाजें हैं
ये लोग हैं
बातें हैं
मगर
ज़ेहन के पीछे
किसी और सतह पे
कहीं जैसे चुपचाप
बरसता है
तसव्वुर तेरा
पत्थर की दीवार पे
लकड़ी की एक फ्रेम में
कांच के अंदर फूल बने हैं
एक तसस्वुर खुशबु का
और कितने सारे पहनावों में बंद किया है
यहाँ सारे चेहरे हैं मांगे हुए से
निगाहों में आंसू भी टांगे हुए से
बड़ी नीची राहें हैं
उचाईयों की
इक निवाले सी निगल जाती है
ये नींद मुझे
रेशमी मोज़े निगल जाते हैं पांव जैसे
सुबह लगता है के
ताबूत से निकला हूँ अभी
दर्द हल्का है
साँस भारी है
जिए जाने की रस्म जारी है
आपके बाद हर घडी हमने
आपके साथ ही गुजारी है
दुआ करो
अजीब सा अमल है ये
ये एक फर्जी गुफ्तगू
और एकतरफा
एक ऐसे शख्स से
ख़याल जिसकी शक्ल है
ख्याल ही सबूत है
आज बिछड़े हैं
कल का डर भी नहीं
जिन्दगी इतनी मुख़्तसर भी नहीं
जख्म दिखते नहीं अभी लेकीन
ठंडे होंगे तो दर्द निकलेगा
ऐश उतरेगा वक्त का जब भी
चेहरा अन्दर से जर्द निकलेगा
कहनेवालों का कुछ नहीं जाता
सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढें जवाब दर्दों के
लोग तो बस सवाल करते हैं
कल जो आयेगा जाने क्या होगा
बीत जाए जो कल नहीं आते
वक्त की शाख तोड़ने वालों
टूटी शाखों पे फल नहीं आते
कच्ची मिट्टी हैं
दिल भी इंसान भी
देखने ही में सख्त लगता हैं
आँसू पोछे तो आँसुओं के निशाँ
खुश्क होने में वक्त लगता है
एक सुबह इक मोड़ पर
मैने कहा उसे रोक कर
हाथ बढ़ा ए ज़िंदगी
आँख मिला के बात कर
रोज़ तेरे जीने के लिये
इक सुबह मुझे मिल जाती है
मुरझाती है कोई शाम अगर
तो रात कोई खिल जाती है
मैं रोज़ सुबह तक आता हूं
और रोज़ शुरु करता हूं सफ़र
हाथ बढ़ा ए ज़िंदगी
आँख मिला के बात कर
तेरे हज़ारों चेहरों में
एक चेहरा है,
मुझ से मिलता है
आँखो का रंग भी एक सा है
आवाज़ का अंग भी मिलता है
सच पूछो तो हम दो जुड़वां हैं
तू शाम मेरी,
मैं तेरी सहर
हाथ बढ़ा ए ज़िंदगी
आँख मिला के बात कर
मैने कहा उसे रोक कर..
बे यारो मददगार ही काटा था सारा दिन
कुछ खुद से अजनबी सा
तन्हा उदास सा
साहिल पे दिन बुझा के मैं
लौट आया फिर वहीँ
सुनसान सी सड़क के खाली मकान में
दरवाज़ा खोलते ही
मेज़ पे रखी किताब ने हलके से फडफडा के कहा
देर कर दी दोस्त....
इक नक़्ल तुझे भी भेजूंगा
ये सोच के ही
तन्हाई के नीचे
कार्बन पेपर रख के मैं
ऊँची ऊँची आवाज़ में बातें करता हूँ
अल्फाज़ उतर आते हैं कागज़ पे लेकिन
आवाज़ की शक्ल उतरती नही
रातों की सियाही दिखती है....
कोई पत्ता भी नहीं हिलता
ना परदों में है जुम्बिश
फिर भी कानों में बहुत तेज़ हवाओं की सदा है कितने ऊँचे हैं ये मेहराब महल के
और मेहराबों से ऊँचा वो सितारों से भरा थाल फलक का
कितना छोटा है मेरा कद...
फर्श पर जैसे किसी हर्फ़ से नुक्ता गिर हो
सैंकड़ों संतों में भटका हुआ मन ठहरे जरा
दिल धडकता है तो बस दौड़ती टापों की सदा आती है
रौशनी बंद भी कर देने से क्या होगा अँधेरा?
सिर्फ आंखें ही नहीं देख सकेंगी ये चौगर्दा
मैं अगर कानों में कुछ ठूंस भी लूं
रौशनी चिंता की तो जेहन से अब बुझ नहीं सकती
ख़ुदकुशी एक अँधेरा है
उपाय तो नहीं
खिड़कियाँ साडी खुली हैं तो हवा क्यूँ नही आती?
नीचे सर्दी है बहुत
और हुआ तुण्ड है शायद
दूर दरवाज़े के बाहर खड़े वो संतरी दोनों
शाम से आग में बीएस सूखी हुई टहनियों को झोंक रहे हैं
मेरी आँखों से वो सूखा हुआ ढांचा नहीं गिरता
जिस्म ही जिस्म तो था
रूह कहाँ थी उसमें
कोढ़ था उसको
तपेदिक था?
ना जाने क्या था?
या बुढापा ही था शायद...
पसलियाँ सूखे हुए केक्रों के शाख्चे जैसे
रथ पे जाते हुए देखा था
चट्टानों से उधर...
अपनी लाठी पे गिरे पेड़ की मानिंद खड़ा था
फिर यकायक ये हुआ
सारथी
रोक नहीं पाया था मुंहजोर समय की टापें
रथ के पहिये के तले
देखा तड़प कर इसे ठंडा होते
ख़ुदकुशी थी?
वो समर्पण था?
वो दुर्घटना थी?
क्या था?
सब्ज़ शादाब दरख्तों के वजूद
अपने मौसम में बिन मांगे भी फल देते हैं
सूख जाते हैं तो सब काट के
इसी आग में ही झोंक दिए जाते हैं
जैसे दरवाज़े पे आमाल के वो दोनों फ़रिश्ते
शाम से आग में बस सूखी हुई टहनियों को झोंक रहे हैं...
रोको मत
टोको मत
इन्हें सोचने दो
मुश्किलों के हल खोजने दो
रोको मत टोको मत
निकलने तो दो आसमां से जुड़ेंगे
अरे अंडे के अन्दर ही कैसे उड़ेंगे यार
सपना रे सपना
है कोई अपना
अंखियों में आ भर जा
अंखियों की डिबिया
भर दे रे निंदिया
जादू से जादूकर जा
सपना रे सपना
है कोई अपना
अंखियों में आ भर जा ना
भटकती हुई आरजू से हाथ छुटा
तो दोनों जमी पे आ रहे
वो घर पहुची
तो
वो ही हुआ
जो सब दस्तानों में होता है
उसकी शादी तय हो चुकी थी
मेंहदी की महक से घर भरा हुआ था
ढोलों की थाप
सहेलियों की एडियों को जमीन नही लगने देती थी
ढोलक की थाप दूर दराज़ के मोहल्ले तक सुनाई दी
जब उसे खबर मिली
तो
वो भी पहुंचा
खिडकियों,दरवाज़ों से झांक झांक के
उसकी नजर पकड़ने की कोशिश करता रहा
मेहँदी सजी दुल्हन तक पहुंचना मुमकिन नही था
एक सहेली दुल्हन के लिए चाय की प्याली ले के आयी
उसने तो मांगी नही थी
सहेली की आँखों की पलक ने झपक के कहा
पी लो
कप में पैगाम भी है
कप की तह में उसने अंगूठी रख के भेजी थी
अंगूठी होठों से पी ली
और
ऊगली में पहन ली
सहेली की मेहँदी लगी हथेली पर उसने लिख के भेज दिया
उसी सनसेट पे मिलना
जो पुल पे मिला था
लेकिन
संदेशा पंहुचा नही
वो जा चुका था
पल भर में सब बदल गया
और
कुछ भी नही बदला
जो बदला था
वो तो गुज़र गया
हर रोज़ जब सूरज गोरुब होता
वो उसी पुल पर खड़ी
उसका इंतजार करती
लेकिन
वो नही आया
एक बार फिर जिंदगी का हाथ उसकी उँगलियों से छूटने लगा
सनसेट के रंग कितने कच्चे होते हैं
सूरज डूबते डूबते गरम कोयले की तरहा डूब गया
और बुझ गया
वो घर से भाग आयी थी
उस रिश्ते से बचने के लिए
जो बिन चाहे उसके दामन से बांधा जा रहा था
उसने संदेशा भिजवाया तो था
उस पुल पे मिलने क लिए
जो दो किनारों को जोड़ता है
हवा जब कोहरे को हिलोरा देती
तो
पूरा पुल झूल जाता
जिंदगी के दोनों सिरे छू लेता
इब्तेदा और इंतेहा
शुरुआत और आखिर
इसी जगहा से उनके रिश्ते की शुरुआत हुई थी
माज़ी से एक आवाज़ आहिस्ता-आहिस्ता उसके करीब आ रही थी
न परों से उड़े
न पैरों पे चले
उसकी मुस्कराहट ने इतना ही कहा था
बाँहों में उठा लो मुझे
मुझसे चला नही जाता
उस रात
बाहों की इक संदली गिरह
दो सांसे कुछ यूँ उलझी थी
के बस
इक ही साँस होती थी थी
वो अभी तक पुल पे खड़ी थी
अतीत से आती आवाज़ और हंसी
बहुत दूर नही लगी
ऐसे ही लगा
जैसे
आवाज़ अभी तक बीती नहीं
शायद कोहरे में हाथ बढ़ाये
तो छू ही ले उसे
घडी देखी
सेकंड की सुई अपने पहरे पर परेड कर रही थी
और
अभी तक
उसके आने की कोई आहट नही थी
रात में क्रैक आ गया था
आधी रात कट चुकी थी
आसमान का रंग बदल रहा था
रात कच्ची पड़ रही थी
कोई पंछी पास के पेड़ से उड़ा
और
सुबह को लाने आसमान की तरफ उड़ लिया
वो पुल के उस किनारे पे आ के खड़ी हो गयी
जहाँ से अगला कदम जिंदगी का आखिरी कदम था
इक भोले भाले भेंड के बच्चे ने उसे रोक लिया
गड़ेरिये भटकी हुई भेंडों को राह दिखाते हैं
ईसा भी येही करते थे
उसका हाथ पकड़ के वो अपने साथ ले गया
अरे
ताल से पानी सूखा है
आसमान तो नही सूख गया
फिर मेघ आयेगा
फिर जल भरेगा
तेरे जाने से तो कुछ बदला नही
रात भी आयी थी
और चाँद भी था
तेरे जाने से तो कुछ बदला नहीं
साँस भी वैसे ही चलती है हमेशा की तरहा
आंख वैसे ही झपकती है हमेशा की तरहा
थोड़ी सी भीगी हुई रहती है
और कुछ बदला नही
होंठ खुश्क होते हैं
प्यास भी लगती है
आज कल शाम से ही
सर्द हवा चलती है
बात करने से धुआं उठता है
जो दिल का नहीं
तेरे जाने से तो कुछ बदला नही
रात भी आयी थी
और चाँद भी था
हाँ मगर नींद नहीं
नींद नहीं..........
वो घर से भाग आयी थी
उस रिश्ते से बचने के लिये
जो बिन चाहे उसके दामन से बांधा जा रहा था
वो कब तक इन्तज़ार करती
कोहरे में खड़ा हुआ पुल तो नज़र आ रहा था
लेकिन उसके सिरे नज़र नहीं आते थे
कभी लगता उसके दोनों सिरे एक ही तरफ़ हैं
और कभी लगता इस पुल का कोई सिरा नहीं है
शाम बुझ रही थी
और आने वाले की कोई आहट नहीं थी कहीं
नीचे बहता दरिया कह रहा था
आओ मेरे आग़ोश में आ जाओ
मैं तुम्हारी बदनामी के सारे दाग छुपा लूंगा
मट्टी के इस शरीर से बहुत
खेल चुके
इस खिलौने के रंग अब उतरने लगे हैं
कच्चे रंग उतर जाने दो
नदी में इतना है पानी
सब धुल जाएगा
मट्टी का टीला है
ये घुल जाएगा
इतनी सी मट्टी है
दरिया को बहना है
दरिया को बहने दो
सारे रंग बिखर जाने दो
An apricot and a walnut stood for long close together
when their shadows fell in water
sometimes as far as going to the other shore altogther…
the walnut still gazes in the direction the river flows
but its height has slightly shrunk
now its shadow does not reflect in the water.
The night in the mountains is something else
The sky never darkens and the river is for-ever alight
So much zari-work can be seen in the sky through the patterns of stars
The wind speaks like someone holding a comb between its teeth
two waterfalls speak so loudly to each other
like rustic friend meeting unexpectedly in a valley
discussing the entire village
Even a poem sleeps with its eyes half closed
The night in the mountains is something else.
Have you seen the soul?
ever sensed it?
standing against the wall of a church on the shore
have you sensed your womb resounding!
the body burnt a hundred times is still a clod of earth
the soul burnt but once becomes gold!
A sigh escapes as I turn a page
the meanings of many words have fallen off
They appear like shrivelled leafless stumps
where meaning will grow no more
Many traditions lie scattered
like the debris of earthen cups
made obsolete by glass tumblers
Each turn of the new page brought a new flavor to the tongue
कोई सफ़ा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे ठूँठ लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते
बहुत-सी इस्तलाहें हैं
जो मिट्टी के सकोरों की तरह बिखरी पड़ी हैं
गिलासों ने उन्हें मतरूक कर डाला
ज़ुबान पर ज़ायका आता था जो सफ्हे पलटने का
उम्मीद भी है घबराहट भी
कि अब लोग क्या कहेंगे,
और इससे बड़ा डर यह है कि
कहीं ऐसा न हो कि लोग कुछ भी न कहें।
एक था बचपन
छोटा सा,
नन्हा सा बचपन,
बचपन के एक बाबूजी थे,
अच्छे सच्चे बाबूजी थे
दोनो का सुंदर था बंधन,
टहनी पर चढ़के जब फूल बुलाते थे
हाथ उँचके तो टहनी तक ना जाते थे
बचपन के नन्हे दो हाथ उठाकर
वो फूलों से हाथ मिलाते थे
चलते चलते,
जाने कब इन राहों में
बाबूजी बस गये बचपन की बाहों में
मुट्ठी में बंद हैं वो सूखे फूल अभी
खुशबू हैं जीने की चाहों में
मेरे होंठों पर उनकी आवाज़ भी हैं
साँसों में सौंपा विश्वास भी हैं
जाने किस मोड़ पे कब मिल जायेंगे वो
पूछेंगे बचपन का एहसास भी है
एक था बचपन....
हवा से तेज़ क्या है
यक्ष ने पूछा
जियादा घास से उगता है क्या
दिमाग
ए यक्ष हवा से तेज़ चलता है
ख़याल उगते हैं बिन बीजे,
बिना सोचे कहीं भी....
रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है
आसमां बुझाता ही नहीं
और दरिया रोशन रहता है
इतना ज़री का काम नज़र आता है
फ़लक पे तारों का
कंघी रख के दांतों में आवाज़ किया करती है हवा
कुछ फटी-फटी झीनी-झीनी,
बालिग़ होते लड़कों की तरह
इतना उंचा-उंचा बोलते हैं दो झरने आपस में
जैसे एक देहात के दोस्त
अचानक मिल कर वादी में गाँव भर का पूछते हों
नज़्म भी आधी आँखें खोल के सोती है
रात पहाड़ों पे कुछ और ही होती है.
बारिश आती है
तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है
टीन की छत,
तिरपाल का छज्जा,
पीपल-पत्ते,
परनाला सब बजने लगते हैं
तंग गली में जाते-जाते
साइकिल का पहिया
पानी की कुल्लियाँ करता है
खुश्क था
तो रस्ते में टिक-टिक छतरी टेक के चलते थे
बारिश में आकाश में छतरी टेक के टप-टप चलते हैं.
Do not erase these lines
let them be.
My Childhas drawn them,
with her little pink hands.
Curved and curly.
What if the lines
do not make a form?
In these lines,
I see my child's hands.
In these lines,
I see myself.
समंदर देख रहा था मैं
समन्दर के अन्दर से मेरी अमृत की कुम्भी आने वाली थी
समन्दर करवटें लेता था रह रह कर
तो बल पड़ते थे पानी में
मेरी बच्ची के नाज़ुक कोख से टीसें गुज़रती हैं
मुझे उस वक्त डर लगता था अमृत मांगने से
तुझे ऐसे ही देखा था
कि जैसे सबने देखा है
मगर फिर क्या हुआ जाने...
कि जब मैं लौटकर आया
तेरा चेहरा मेरी आँखों में रोशन था
किसी झक्कड़ के झोंके से गिरी बत्ती
बस एक पल का अँधेरा
फिर अचानक आग भड़की
और हर एक चीज़ जल उठी
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम
बहुत जी चाहता है
फिर से बो दूँ अपनी आँखें
तुम्हारे ढेर सारे चेहरे उगाऊं
और बुलाऊं बारिशों को
बहुत जी चाहता है
कि फुर्सत हो,तसव्वुर हो
तसव्वुर में ज़रा सी बागबानी हो!
मगर जानां
एक ऐसी उम्र में आकर मिली हो तुम
किसी के हिस्से की मिटटी नहीं हिलती
किसी की धूप का हिस्सा नहीं छनता
मगर क्या क्यारी के पौधे
पास अपने अब किसी को
पाँव रखने के लिए भी थाह नहीं देते
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम?