Monday, 25 August 2014

अचानक

तुझे ऐसे ही देखा था
कि जैसे सबने देखा है
मगर फिर क्या हुआ जाने...
कि जब मैं लौटकर आया
तेरा चेहरा मेरी आँखों में रोशन था
किसी झक्कड़ के झोंके से गिरी बत्ती
बस एक पल का अँधेरा
फिर अचानक आग भड़की
और हर एक चीज़ जल उठी

ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम

ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम
बहुत जी चाहता है
फिर से बो दूँ अपनी आँखें
तुम्हारे ढेर सारे चेहरे उगाऊं
और बुलाऊं बारिशों को
बहुत जी चाहता है
कि फुर्सत हो,तसव्वुर हो
तसव्वुर में ज़रा सी बागबानी हो!

मगर जानां
एक ऐसी उम्र में आकर मिली हो तुम
किसी के हिस्से की मिटटी नहीं हिलती
किसी की धूप का हिस्सा नहीं छनता
मगर क्या क्यारी के पौधे
पास अपने अब किसी को
पाँव रखने के लिए भी थाह नहीं देते
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम?

ग्रहण

कॉलेज के रोमांस में ऐसा होता था
डेस्क के पीछे बैठे बैठे
चुपके से दो हाथ सरकते
धीरे धीरे पास आते...
और फिर एक अचानक
पूरा हाथ पकड़ लेता था
मुट्ठी में भर लेता था
सूरज ने यों ही पकड़ा है
चाँद का हाथ फलक में आज

Saturday, 23 August 2014

चलो

नये नये ही चाँद पे रहने आये थे
हवा ना पानी,
गर्द ना कूड़ा
ना कोई आवाज़,
ना हरक़त
ग्रेविटी पे तो पाँव नहीं पड़ते हैं कहीं पर
अपने वतन का भी अहसास नही होता

जो भी घुटन है
जैसी भी है,
चल कर ज़मीं पर रहते हैं
चलो चलें,
चल कर ज़मीं पर रहते हैं

रस्साकशी

उम्र के खेल में इकतरफा है ये रस्साकशी
इक सिरा मुझको दिया होता तो इक बात भी थी

आंख मिचोली

छोटा सा शीशे का टुकड़ा
घास के अन्दर छुप के बैठा
मेरी आँख पे सूरज मार के ख़ुश होता है,
हँसता है
सूरज ख़ुश है,

छोटा सा शीशे का टुकड़ा
घास में रख के खेल रहा है
मेरी आँख पे छींटे मार के छेड़ रहा है
आँख पे एक हथेली रख के
मैं फ़ौरन दोनों की आँखों से ओझल हो जाता हूँ

उँगलियों की झिर्रियों से वो दोनों झाँक के
मुझको ढूँढने लगते हैं
और मैं आँखें बंद किये
तेरी गोद में सर रख के छुप जाता हूँ!

क़ायनात से आँख मिचोली खेल रहा हूँ!!

कमीज़

ज़िदगी किस कदर आसां होती
रिश्ते गर होते लिबास
और बदल लेते क़मीज़ों की तरह

Friday, 22 August 2014

चलते हैं

आदमी के पाँव दो हैं,
पाँव-पाँव चलता है!

पंछी भी कभी-कभी तो
छाँव-छाँव चलता है!

पैर हैं न पंख हैं,
फिर भी यह हवा चले!

चलने वाले कैसे-कैसे,
देखो किस तरह चले!

अपने आप चलते-चलते
मेज़ पर से गिर पड़ी!
माधव ने कहा था,
"कल भी चल रही थी यह घड़ी!

"माधव ने बताया,
"बाबू, फ़ोन फिर से चल पड़ा!

मैंने समझा,
नंगे पाँव धूप में निकल पड़ा!

"गुंडों की लड़ाई में तो
हॉकियाँ भी चलती हैं!

कहते हैं,
कभी-कभी चालाकियाँ भी चलती हैं!

ठाँय-ठाँय करती,
सनसनाती गोलियाँ चलीं!

बिन सड़क के,
बस्तियों में कितनी बोलियाँ चलीं!

हिलती-डुलती भी नहीं,
मगर दुकान चलती है!

मुँह में है बँधी हुई,
मगर ज़बान चलती है!

गर्मी, सर्दी, आँधी, पानी,
एक जैसा चलता है!

रात हो या दिन हो कहते हैं कि
पैसा चलता है!

दाएँ, बाएँ हर तरफ
रिवाज़ चलते रहते हैं!

बैठे-बैठे भी तो
काम-काज चलते रहते हैं!

शायर

जलते शहर में बैठा शायर
इससे ज्यादा करे भी क्या?

अल्फ़ाज़ से जख्म नही भरते
नज़्मो से खराशे नही भरती

माचिस

मैं सिगरेट तो नही पीता
पर हर आने वाले से पुछ लेता हूँ
माचिस हैं?
बहोत कुछ है
जिसे मैं जला देना चाहता हूँ...
मगर हिम्मत नही होती......

झड़ी

बंद शीशों के परे देख,
दरीचों के उधर
सब्ज़ पेड़ों पे,
घनी शाखों पे,
फूलों पे
वहाँ कैसे चुपचाप बरसता है
मूसलसल पानी

कितनी आवाज़ें हैं,
ये लोग हैं,
बातें हैं

मगर
ज़हन के पीछे किसी और ही सतह पे कहीं
जैसे चुपचाप बरसता है तसव्वुर तेरा

लम्हे नज्में

लम्हो पर बेठी नज्मो को
तितली जाल मे बन्द कर लेना

फिर काट के पर उन नज्मो को
अल्बम मे पिन करते रहना

जुल्म नही तो और क्या है ?

लम्हे कागज पर गिर के ममियाये जाते है
नज्मो के रंग रह जाते है पोरों पर !!

एतबार

तुम गये तो और कुछ नही हुआ
दिल पे ऐतबार घट गया मेरा
में जो दिल के पीछे उसके नक्शे पा के पांव रख के चलता था
चलते चलते देखा तो निशान खत्म हो गये

तुम गये तो और कुछ नही हुआ
दिल पे ऐतबार घट गया मेरा !!

वक्त

तुम्हारी फुर्कत में जो गुजरता है,
और फिर भी नहीं गुजरता,
मैं वक्त कैसे बयाँ करूँ ,

वक्त और क्या है?
कि वक्त बांगे जरस नहीं
जो बता रहा है
कि दो बजे हैं,
कलाई पर जिस अकाब को बांध कर
समझता हूँ वक्त है,
वह वहाँ नहीँ है!

वह उड़ चुका
जैसे रंग उड़ता है मेरे चेहरे का,
हर तहय्युर पे,
और दिखता नहीं किसी को,

वह उड़ रहा है कि जैसे इस बेकराँ समंदर से भाप उड़ती है
और दिखती नहीं कहीं भी,

कदीम वजनी इमारतों में,
कुछ ऐसे रखा है,
जैसे कागज पे बट्टा रख दें,
दबा दें,
तारीख उड़ ना जाये,

मैं वक्त कैसे बयाँ करूँ,
वक्त और क्या है?

कभी कभी वक्त यूँ भी लगता है मुझको
जैसे,
गुलाम है!

आफ़ताब का एक दहकता गोला उठा के
हर रोज पीठ पर वह,
फलक पर चढ़ता है चप्पा चप्पा कदम जमाकर,
वह पूरा कोहसार पार कर के,
उतारता है,
उफुक कि दहलीज़ पर दहकता हुआ सा पत्थर,
टिका के पानी की पतली सुतली पे,
लौट जाता है अगले दिन का उठाने गोला ,

और उसके जाते ही
धीरे धीरे वह पूरा गोला
निगल के बाहर निकलती है रात,
अपनी पीली सी जीभ खोले,

गुलाम है वक्त गर्दिशों का,
कि जैसे उसका गुलाम मैं हूँ !!

लफ्ज़

अल्फाज जो उगते, मुरझाते, जलते, बुझते रहते हैं मेरे चारों तरफ,
अल्फाज़ जो मेरे गिर्द पतंगों की सूरत उड़ते रहते हैं रात और दिन
इन लफ़्ज़ों के किरदार हैं,
इनकी शक्लें हैं
रंग रूप भी हैं
और उम्रें भी!

कुछ लफ्ज़ बहुत बीमार हैं,
अब चल सकते नहीं,
कुछ लफ्ज़ तो बिस्तरेमर्ग पे हैं,
कुछ लफ्ज़ हैं जिनको चोटें लगती रहती हैं,
मैं पट्टियाँ करता रहता हूँ!

अल्फाज़ कई,
हर चार तरफ बस यू हीं थूकते रहते हैं,
गाली की तरह
मतलब भी नहीं,
मकसद भी नहीं

कुछ लफ्ज़ हैं मुँह में रखे हुए चुइंगगम की तरह
हम जिनकी जुगाली करते हैं!

लफ़्ज़ों के दाँत नहीं होते,
पर काटते हैं,
और काट लें तो फिर उनके जख्म नहीं भरते!

हर रोज मदरसों में 'टीचर' आते है
गालें भर भर के,
छः छः घंटे अल्फाज लुटाते रहते हैं,
बरसों के घिसे, बेरंग से, बेआहंग से,
फीके लफ्ज़
कि जिनमे रस भी नहीं
मानि भी नहीं!

एक भीगा हुआ,
छ्ल्का छल्का,
वह लफ्ज़ भी है,
जब दर्द छुए तो आँखों में भर आता है
कहने के लिये लब हिलते नहीं,
आँखों से अदा हो जाता है!!

Thursday, 7 August 2014

हिरन

सुबह से शाम हुई
और हिरन मुझको छलावे देता
सारे जंगल में परेशान किए घूम रहा है अब तक...
उसकी गरदन के बहुत पास से गुजरे हैं कई तीर मेरे...
वो भी अब उतना ही होशियार है
जितना मै हूँ!

इक झलक दे के जो गुम होता है वो पेड़ों में..
मैं वहां पहुँचता हूँ तो टीले पे..
कभी चश्मे के उस पार नज़र आता है..
वो नजर रखता है मुझ पर!
मैं उसे आंख से ओझल होने नही देता!!

कौन दौड़ाये हुए है किसको!
कौन अब किसका शिकारी है पता ही नही चलता...!

सुबह उतरा था मैं जंगल में
तो सोचा था के...!
उस शोख हिरन को
नेजे की नोक पे
परचम की तरह तान के
मैं शहर में दाखिल होऊंगा...!

दिन मगर ढलने लगा है...
दिल में इक खौफ सा अब बैठ रहा है
के..!
बिल आखिर ये हिरन ही...!
मुझे सींगों पर उठाए हुए
इक गार में दाखिल होगा...!!

खाली कागज़

खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?
एक ख़ामोश सा जवाब तो है
डाक से आया है तो कुछ कहा होगा
कोई वादा नहीं...
लेकिन
देखें कल वक्त क्या तहरीर करता है

या कहा हो कि...
खाली हो चुकी हूँ मैं
अब तुम्हें देने को बचा क्या है?

सामने रख के देखते हो जब
सर पे लहराता शाख का साया
हाथ हिलाता है जाने क्यों?

कह रहा हो शायद वो...
धूप से उठ के दूर छाँव में बैठो!

सामने रौशनी के रख के देखो तो
सूखे पानी की कुछ लकीरें बहती हैं

इक ज़मीं दोज़ दरया,
याद हो शायद
शहरे मोहनजोदरो से गुज़रता था!

उसने भी वक्त के हवाले से
उसमें कोई इशारा रखा हो...

या

उसने शायद तुम्हारा खत पाकर
सिर्फ इतना कहा कि,

लाजवाब हूँ मैं!

मदारी

चलो इन बादलों सारी परतें छील के देखें...
ज़रूर इनके लबादों में कहीं पोशीदा जेबें भी होंगी...

टटोलें इनकी जेबें...
और देखें,कहाँ पानी की बूंदें हैं?
कहाँ ओले छिपाए हैं?
कहाँ रखते हैं डमरू?
जब बजाते हैं तो
बच्चे चौंक जाते हैं!

किसी इक belt में हंटर भी छुपा होगा...
हवाओं के गुब्बारे भी भरे होंगे...

तुम्हें लगता नहीं
बादल बड़े शातिर मदारी हैं!

Wednesday, 6 August 2014

ढिबरी

मैं इस शहर की मशीन में फिट हूँ जैसे ढिबरी
ज़रूरी है ये ज़रा सा पुर्जा...

अहम भी है क्योंकि रोज़ के रोज़ तेल देकर,
इसे ज़रा और कस के जाता है
चीफ़ मेरा...

वो रोज़ कसता है,
रोज़ इक पेंच और चढ़ता है जब नसों पर,
तो जी में आता है ज़हर खा लूं...
या भाग जाऊं....

तेरी आँखें

तेरी आँखें हैं
या सजदे में हैं
मासूम नमाज़ी

पलकें खुलती हैं
तो यूं गूँज के उठती है नज़र

जैसे मंदिर से जरस की चले नमनाक सदा

और झुकती हैं तो
बस जैसे अज़ान ख़त्म हुई हो

चुपचाप

बंद शीशे के परे देख,
दरीचों के उधर
सब्ज़ पेड़ों पे,
घनी शाखों पे,
फूलों पे
वहाँ कैसे चुपचाप बरसता है मुसलसल पानी

कितनी आवाजें हैं,
ये लोग हैं,
बातें हैं
मगर ज़हन के पीछे
किसी और ही सतह पे कहीं
जैसे चुपचाप बरसता है तसव्वुर तेरा

इक राह

सहरा की तरफ़ जाकर,
इक राह बगूलों में
खो जाती है चकरा कर
रुक रुक के झिझकती सी,
इक मौत की ठंडी सी वादी में उतरती है
इक राह उधडती सी छिलती हुई काँटों से
जंगल से गुज़रती है
इक दौड़ के जाती है
और कूद के गिरती है
अनजानी ख़लाओं में

शाम

रात और दिन कितने खूबसूरत दो वक़्त हैं,
और कितने खूबसूरत दो लफ्ज़
इन दो लफ़्ज़ों के बीच में,
एक वक़फ़ा आता है,
जिसे शाम का वक़्त कहते हैं
ये वो वक़्त है,
जिसे न रात अपनाती है,
न दिन अपने साथ लेकर जाता है
इस छोड़े हुए,
या छूटे हुए लावारिस वक़्त से,
शायर अक्सर कोई न कोई लम्हा चुन लेता है,
और सी लेता है अपने शेरों में
लेकिन कोई कोई शाम भी ऐसी बाँझ होती है,
के कोई लम्हा देकर नहीं जाती

ख़ाली समंदर

उसे फिर लौट के जाना है
ये मालूम था उस वक़्त भी
जब शाम की सुर्खो
सुनहरी रेत पर वह दौड़ती आई थी
और लहरा के
यूं आग़ोश में बिखरी थी
जैसे पूरे का पूरा समंदर
ले के उमड़ी है
उसे जाना है
वो भी जानती थी
मगर हर रात फिर भी
हाथ रख कर चाँद पर
खाते रहे कसमे
ना मैं उतरूँगा अब साँसों के साहिल से
ना वो उतरेगी
मेरे आसमाँ पर झूलते तारों की पींगों से
मगर जब कहते कहते दास्ताँ
फिर वक़्त ने लम्बी जम्हाई ली
ना वो ठहरी
ना मैं ही रोक पाया था
बहुत फूँका सुलगते चाँद को
फिर भी
उसे इक इक कला घटते हुए देखा
बहुत खींचा समंदर को
मगर साहिल तलक हम ला नहीं पाये
सहर के वक़्त फिर
उतरे हुए साहिल पे
इक डूबा हुआ ख़ाली समंदर था!

मरियम

रात में देखो झील का चेहरा
किस कदर पाक पुरसुकून गमगीन
कोई साया नहीं है पानी पर
कोई सिलवट नहीं है आँखों में

नीन्द आ जाये दर्द को जैसे

जैसे मरियम उदास बैठी हो

जैसे चेहरा हटा के चेहरे का

सिर्फ एहसास रख दिया हो वहाँ

आह!

ठंडी साँसे ना पालो सीने में

लम्बी सांसों में सांप रहते हैं

ऐसे ही एक सांस ने इक बार

डस लिया था हसी क्लियोपेत्रा को

मेरे होटों पे अपने लब रखकर

फूँक दो सारी साँसों को 'बीबा'

मुझको आदत है ज़हर पीने की

अफसाने

खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में

एक पुराना खत खोला अनजाने में

जाने किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में

दर्द मज़े लेता है जो दुहराने में

शाम के साये बालिस्तों से नापे हैं

चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में

रात गुज़रते शायद थोड़ा वक्त लगे

ज़रा सी धूप दे उन्हें मेरे पैमाने में

दिल पर दस्तक देने ये कौन आया है

किसकी आहट सुनता है वीराने मे

Sunday, 3 August 2014

कोट

इतने अरसे बाद हेंगर से कोट निकाला है
कितना लंबा बाल मिला है कॉलर पर
जाड़ों में पहना था याद आता है

बास

पार्टी वाला बोला :
''नौ साल तक लड़ लड़ के हमने,तूम लोगों के लिए ये कोलोनी बनवा के दी.तूम लोगों को झोंपड़पट्टी से निकाला,सिमेंट के पक्के घर बना के दिए हैं.और अब तुम बोलता है...डब्बे-बोतल में बंदकर दिया.''

मेरे घर वाला,हमेशा पार्टी वाले से बहस करता था :
''तू इसे बस्ती बोलता है.आदमीयों का गोदाम लगता है.सबको पार्सल में पैक कर के रख दिया है!''

मैं दांतों में दुपट्टा दबाये सब सुनती रहती हूं. मेरे को क्या लेना इन लोग की पालिटिक्स से?वो भी लगा रहता है.मेरा आदमी!
''अरे साला,दो बिल्डिंग के बीच में दो हाथ गाड़ी की जगह तो होनी चाहिए.इधार से जाता आदमी,उधार से आते आदमी से टकरा जाता है.''

''क्या बात करता है मैथ्यू:
पुलिस का दो जीप गुज़र सकता है.तू नाप के देख ले.''
''अबे छोड़...दो चारपाई बिछा के ताश खैल सकता है क्या?''
''अब बम्बई की गलियां चारपाई बिछाने के लिए तो नहीं है,दोस्त!''

मैं भी सोचती हूं,सारा रंग-रूप ही बदल गया इस ज़मीन का.पहले आधा साल दलदल की तरह कीचड़ रहता था यहां.कुछ खाड़ी का पानी आ जाता था.और आधा साल सूखे कीचड़ की काली मट्टी उड़ती थी.नंग धड़ंग बच्चे,कुत्ते,कतुरे जानी की मुर्गियां और मुर्ग़े सब पल जाते थे.बच्चे,पिल्लों को रस्सी बांधा के घसीटते रहते थे.बड़े होते होते उन सब कुत्तों की गर्दनें लंबी हो जाती थीं.

सरकार ने अब इसकी आधी ज़मीन पर,सिमेंट की तीन मंज़िला पक्की बिल्डिंग बना दी हैं. और एक-एक मंज़िल पर चोबीस-चोबीस फ्लैट हैं.हर एक फ्लैट में एक कमरा,एक रसोईघर,जिसमें धुआँ ऊन के गोले की तरह लिपटा चला जाता है.एक नल ख़ना! और एक-एक बिल्डिंग में,हर मंज़िल पर दो पाखाने बना दिए हैं.ताकि पानी के डब्बे उठा कर दूर ना जाना पड़े.लाईन अब भी लगती है.लेकिन पहले ये लाईन खुले में लगती थीं.अब दीवार से लगे-लगे सीढ़ियां चढ़ जाती हैं.

जब ये बिल्डिंग बननी शुरू हुई थीं तो सारी झोंपड़ियां घसीट के,मैदान के एक तरफ़ रख दी गई थीं.जैसे ग़फ्फ़ार मंडी में अपनी ख़ाली टोकरियों का झोपड़ियां तो फिर भी काफ़ी सब्ज़ रहती थीं.

हमारी झोंपड़ी के सामने थोड़ी-सी खुली जगह थी,जहां संतोष ने करैले की बेल लगा दी थी. और खपचियों से बांध के दीवार सी खड़ी कर ली थी.उससे साथ की झोंपड़ी भी अलग हो गई थी.लेकिन बेल तो बेल ही थी.जहां साथ वाले को दो करैले लटकते नज़र आए,वहीं कपड़े धोने के बहाने बाल्टी पानी की रखी और मौक़ा पाते ही हाथ डालकर करैले चुरा लिए और पानी की बाल्टी में ही कपड़ों के नीचे रख के अंदर ले आए.

चार आलू और तुलसी तो थी ही जिस पर रोज़ शाम को दिए जल जाते थे.किसी को पता ही नहीं वो क्यों लगाई जाती है.बत्ती क्यों जलाते हैं.अमीना के यहां भी,करीमा के यहां भी,शान्ती और पूरो के यहां भी,सभी कहती थीं,
''जब भी बुढ़ा खांसे,मैं तो तुलसी डाल के काढ़ा पीला देती हूं.''...कद्दु की बेल तो झोंपड़ी की छत पर भी फैल जाती थी.मगर आन्टी तो आन्टी है ना,उस ने भट्ठी लगा रखी थी छोटी सी.अपनी झोंपड़ी के पीछे,बख्शी की तरह नहीं.जिसने मैदान के एक कोने में जगह बना रखी थी.पन्द्रह-बीस रोज़ में एक ही बार भट्ठी चढ़ाता था.दारू के डरम भर के एक झग्गी में,महफ़ूज़ कर लिया करता था.जिस रोज़ उसकी भट्टी लगनी होती थी,उस रोज़ सुबह ही से कुछ हवलदार उसके घर की तरफ़ घूमते नज़र आने लगते थे.

उसकी दो झोंपड़ियां और भी थीं.इज्ज्तदार लोग अंदर बैठ के पीते थे.और मामुली इज्ज्त वाले,जो ना ऊतरती थी,ना चढ़ती थी,वो बाहर बैठ कर ठर्रा पीते थे.और सामने प्लेट में रखा नमक चाटते रहते थे.लेकिन आंटी तो आंटी थी.वो बड़ी नफ़ासत से दारू बनाती थी.सड़े गले फल भी डालती थी. और'नोसादर'तो बहुत ही कम!

उसकी दारू में रंग भी होता था.लेकिन बोतल में भर के बेचती थी.ऊधर बैठ के कोई नहीं पीता था.और जो कोई ख़ाली बोतल साथ ले आए,एक रुपया बोतल का कम कर देती थी. उसके अपने बंधे हुए ग्राहक थे.वही आते थे और दस बजे के बाद कोई नहीं.

फिर वो खुद पी के धुत्त हो जाती थी और बड़े का गोश्त खा के सो जाती थी.कोई जगा दे तो ऐसी झंकारती गालियां पढ़ती थीं कि सारी बस्ती में रस टपक जाता था.अब तो वो भी दीवारों में बंद हो गई है.उसका तो गला ही घुट गया है.पहले वो इतनी अकेली नहीं लगती थी.

जानी भी कहता है,अब होटल की नौकरी चलती नहीं.उसकी मुर्ग़ीयां,कुछ बिक गईं,कुछ खा गए,कुछ मर गईं.अब दूसरे और तीसरे माले पर मुर्ग़ीयां कहां से पाले?

ग़फ्फ़ार ने भी इस साल बकरा नहीं लिया. कुरबानी में अपनी बकरी काट डाली.कहता है,पहले खोल देते थे तो कचरापट्टी में अपना चारा ढूंढ लेती थी

मेरा घर वाला भी पहले कुछ दोस्तों यारों को साथ ले आता था.झोंपड़ी के बाहर,चारपाई डाल के सब पीते थे.हुलड़ करते थे.और लो लुढ़क जाता था,रात वहीं पड़ जाता.सुबह डयूटी से पहले उठ के चला जाता.
अब उसने भी दोस्तों को लाना छोड़ दिया. एक ही कमरे में सारे मरद और औरतें क्या करें?

तब बच्चे फ़र्श पर पड़ रहते थे.मरद बाहर सो जाते थे.औरतें रात को पानी भर के,अपने-अपने मिमियाते बच्चों को छाती से लिपटा के सो जाती थीं.अब क्या करें?

बड़े बच्चे आंखें फाड़े सब देखते रहते हैं.मैं तो कई बार अपने मरद से कह चुकी हूं.ये भी साली कोई ज़न्दगी है?
दरबों में बंद कर दिया है सरकार ने.पता है क्यों?
ताकि ग़रीबी की बास बाहर ना जाए.चल मकान बेच के,कहीं और चलते हैं.किसी और झोंपड़पट्टी में जगह मिल जाएगी...