A poem perched on a moment
Imprisoned in a butterfly net
Then its wings cut off
To keep it pinned in an album
If this is not justice, what is?
Entangled in the paper the moments are mummified
Only the colours of the poem remain on my fingertips!
A poem perched on a moment
Imprisoned in a butterfly net
Then its wings cut off
To keep it pinned in an album
If this is not justice, what is?
Entangled in the paper the moments are mummified
Only the colours of the poem remain on my fingertips!
एक ही सूरज है सबके लिए
वही धूप देता है
वही छांव करता है
अगर आप धूप में हैं
तो इन बच्चों पे छांव कीजिये
और अगर छांव में हैं
तो इन पर धूप आने दीजिये
ये विकलांग बच्चे
मोहताज़ नही
ज़रूरतमंद हैं
हमदर्दीे और प्यार के
सूरज की पहली रोशनी
आरुषी यही करती है
मुन्ने ने
माँ को बुला के पूछा
माँ,कहाँ से आया था मैं
और तुमको मिला कहाँ?
अध् रोयी,अध् हँसती माँ
छाती से लगा के बोली थी
इच्छा बन के आये थे
और तुम मेरे मन में थे
तुम मेरे बचपन के गुडिया खेल में थे
जंग का कूड़ा एक जगह पर जमा हुआ है
पहली बार है
इतने सारे बाजू टाँगें हाथ और सर और पांव
ऐसे अलग अलग बिखरे देखे हैं
बचे खुचे पुर्जे लगते हैं
स्पेयर पार्ट्स हैं
बाजू एक जुलाहे का हिलता है अब तक
काँप रहा है या कुछ कात रहा है
टांग है एक खिलाडी की
रन आउट हुआ है
घर तक दौड़ते दौड़ते राह में मारा गया
टूटे फूटे शेर अभी तक सर में खर्र खर्र बजते हैं
उँगलियाँ रेंग रही हैं
कुछ मिटटी में तारीख दर्ज करने की कोशिश लगती है
पुर्जा पुर्जा खोल के एक मैकेनिक ने उनकी मरम्मत चाही थी
बुरा लगा था उसको
ये पुर्जे आवाज़ करते हैं
मुझे खर्ची में पूरा दिन हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है
झपट लेता है अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है
तो गिरने की आहट भी नही होती
खरे दिन को भी मैं खोटा समझ के भूल जाता हूँ
गिरेबाँ से पकड़ के मांगने वाले भी मिलते हैं
तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है
तुझे किश्तें चुकानी हैं
जबरदस्त कोई गिरवी भी रख लेता है
ये कहकर
अभी दो चार लमहे खर्च करने के लिए रख ले
बकाया उमर के खाते में लिख देते हैं
जब होगा,हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन एक बार मैं अपने लिए रख लूँ
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है
बारिश होती है जब
तो इन गाढ़ी पत्थर की दीवारों पर
भीगे भीगे नक़्शे बनने लगते हैं
हिचकी हिचकी बारिश तब
पहचानी सी इक लिखाई लगती है
बारिश कुछ कह जाती है
ऐसे ही अश्कों से भीगे ख़त शायद
तुमने पहले देखा हो
तिलस्मी शहर के मंज़र अजब हैं
अकेले रात को निकलो सियाह साटिन की सड़कों पर
तिलस्मी चेहरे ऊपर जगमगाती होर्डिंग पर झूलते हैं
सितारे झांकते हैं,नीचे सड़कों पर
वहाँ चढ़ने के जीने ढूंढने पड़ते हैं
पातालों में गुम होकर
यहाँ जीना भी जादू है
यहाँ ख्वाब भी टांगो पर चलते हैं
उमंगें फूटती हैं
जिस तरहा पानी में रखे मूँग के दाने चटखते है
तो जुबान उगने लगती है
यहाँ दिल खर्च हो जाते हैं अकसर
कुछ नही बचता
सभी चाटे हुए पत्तल हवा में उड़ते रहते हैं
समंदर रात को जब आंख बंद करता है
ये नगरी
पहन के सारे जेवर आसमा पर अक्स अपना देखा करती है
कभी सिंदबाद भी आया होगा इस ज़ज़ीरे पर
ये आधी पानी आधी ज़मीं पर
जिन्दा मछली देखकर हैरान हुआ होगा
सफ़ेद चील जब थक कर कभी नीचे उतरती है
पहाड़ों को सुनाती है पुरानी दास्तान
पुराने पेड़ो की
वहां देवदार का इक ऊँचे कद का
पेड़ था पहले
वो बादल बांध लेता था
कभी पगड़ी की सूरत अपने पत्तों पर
कभी दुशाले की सूरत उसी को ओढ़ लेता था
हवा की थाम के बह कभी जब झूमता था
उसे कहता था
मेरे पांव अगर जकड़े नही होते
मैं तेरे साथ ही चलता
उधर शीशम था
कीकर से कुछ आगे
बहुत लड़ते थे वो दोनों
मगर सच है कि कीकर उसके ऊँचे कद से जलता था
सुरीली सीटियाँ बजती थी जब शीशम के पत्तों में
परिंदे बैठ के शाखों पे
उसकी नकलें करते थे
वहां इक आम भी था
जिस पर इक कोयल कई बरसों तक आती रही
जब बौर आता था
उधर दो तीन थे जो गुलमोहर
अब तक बाकी है
वो अपने जिस्म पर खोदे हुए नामों को ही सहलाता रहता है
उधर इक नाम था जो चाँदनी से इश्क करता था
नशे में नीली पड़ जाती थी सारी पत्तियां उसकी
जरा और उस तरफ परली पहाड़ी पर
बहुत से झाड़ थे जो लम्बी लम्बी सांसें लेते थे
मगर अब एक भी दिखता नही है
उस पहाड़ी पर कभी देखा नहीं
सुनते हैं
उस वादी के दामन में
बड़े बरगद के घेरे में बड़ी इक चम्पा रहती थी
जहाँ से काट ले कोई
वही से दूध बहता था
कई टुकड़ों में बेचारी गयी थी अपने जंगल से
सफ़ेद चील इक सूखे हुए से पेड़ पर बैठी
पहाड़ों को सुनाती है पुरानी दास्तानें ऊँचे पेड़ो की
जिन्हें इन पस्त कंद इंसान ने काटा है
गिराया है
कई टुकड़े किये हैं और जलाया है
देर तक बैठे हुए दोनों ने बारिश देखी
वो दिखाती थी मुझे बिजली के तारों पे लटकती हुई बूंदें
जो ताकुब में एक दुसरे के
और एक दुसरे को छूते ही तारों से टपक जाती थीं
मुझको ये फ़िकर के
बिजली का करंट छु गया नंगी किसी तार से तो
आग के लग जाने का बायस होगा
उसने कागज़ की कई कश्तियाँ पानी में उतारीं
और ये कह के बहा दीं के
समंदर में मिलेंगे
मुझको ये फिकर के इस बार भी सैलाब का पानी
कूद के उतरेगा कोहसार से जब
तोड़ के ले जायेगा ये कच्चे किनारे
ओक में भर के वो बरसात का पानी
अधभरी झीलों को तरसाती रही
वो बहुत छोटी थी,कमसिन थी
वो मासूम बहुत थी
आबिसारों के तरन्नुम पे कदम रखती थी
और गूंजती थी
और मैं उम्र के इफ़्कार में गुम
तजुर्बे हमराह लिए
साथ ही साथ में बहता हुआ
चलता हुआ
बहता गया
मैं कायनात में ,सय्यारों में भटकता था
धुएँ में धूल में उलझी हुई किरण की तरह
मैं इस जमीं पे भटकता रहा हूँ सदियों तक
गिरा है वक्त से कट कर जो लम्हा
उसकी तरह
वतन मिला तो गली के लिए भटकता रहा
गली में घर का निशाँ तलाश करता रहा बरसों
तुम्हारी रूह में अब ,जिस्म में भटकता हूँ
तुम्हारी कोख से जनमू तो फ़िर पनाह मिले ..
तुम्हारे गम की डली उठा कर
जुबान पर रख ली हैं मैंने
वह कतरा कतरा पिघल रही है
मैं कतरा कतरा ही जी रहा हूँ
पिघल पिघल कर गले से उतरेगी
आखरी बूंद दर्द की जब
मैं साँस की आखरी गिरह को भी खोल दूंगा
मैं जब छांव छांव चला था अपना बदन बचा कर
कि रूह को एक खूबसूरत जिस्म दे दूँ
न कोई सिलवट .न दाग कोई
न धूप झुलसे, न चोट खाएं
न जख्म छुए, न दर्द पहुंचे
बस एक कोरी कंवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ,
रूह को मैं
मगर तपी जब दोपहर दर्दों की,
दर्द की धूप से जो गुजरा
तो रूह को छांव मिल गई है .
अजीब है दर्द और तस्कीं का साँझा रिश्ता
मिलेगी छांव तो बस कहीं धूप में मिलेगी ...