Friday, 17 October 2014

ढूंढता है

इन उम्र से लम्बी सड़कों को
मंज़िल पे पहुँचते देखा नहीं
बस दौडती फिरती रहती हैं
हम ने तो ठहरते देखा नहीं
इस अजनबी से शहर में
जाना पहचाना ढूंढता है

बहाना ढूंढता है

दिन खाली खाली बर्तन है
और रात है जैसे अंधा कुंवा
इन सूनी अंधेरी आँखों में
आंसू की जगह आता है धुंआ
जीने की वजह तो कोई नहीं
मरने का बहाना ढूंढता है

वक़्त लगता है

कच्ची मिट्टी है दिल भी इंसान भी
देखने ही में सख्त लगता है
आंसू पोंछें के आंसू के निशाँ
खुश्क होने में वक़्त लगता है

नहीं आते

कल जो आयेगा जाने क्या होगा
बीत जाएँ जो कल नहीं आते
वक़्त की शाख तोड़ने वालों
तूरी शाखों पर फल नहीं आते

न जाने गए किधर तन्हा

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा

क़ाफिला साथ और सफर तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं

उम्र गुज़री है इस कदर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे

रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में

रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था

फिर न जाने गए किधर तन्हा

ये भस्म नहीं होता

दिल दर्द का टुकड़ा है
पत्थर की डली सी है
ये अँधा कुँवा है या
ये बंद गली सी है
ये छोटा सा  लम्हा है
जो ख़त्म नहीं होता
मैं लाख जलाता हूँ
ये भस्म नहीं होता

छोड़ आए हम वो गलियां

जहां तेरे पैरों के कँवल गिरा करते थे
हँसे तो दो गालों में भँवर पड़ा करते थे
तेरी कमर के बल पे नदी मुड़ा करती थी
हंसी को सुनके तेरी फ़सल पका  करती थी

छोड़ आए हम वो गलियां 


जहाँ  तेरी एड़ी से धूप उड़ा करती थी
सुना है उस चौखट पे अब शाम रहा करती है
लटों से उलझी लिपटी रात  एक  हुआ करती थी
कभी कभी तकिये पे वो भी मिला करती है

छोड़ आए हम वो गलियां  


 

चटखा काँच अभी बाकी है!!

कल सुबह जब बारिश ने आकर खिड़की पर
                    दस्तक दी, थी
नींद में था मैं --बाहर अभी अँधेरा था!

ये तो कोई वक्त नहीं था, उठ कर उससे मिलने का!
मैंने पर्दा खींच दिया--
गीला गीला इक हवा का झोंका उसने
फूँका मेरे मुँह पर, लेकिन--
मेरी 'सेन्स आफ ह्युमर' भी कुछ नींद में थी--
मैंने उठकर ज़ोर से खिड़की के पट
                     उस पर भेड़ दिए--
और करवट लेकर फिर बिस्तर में डूब गया!

शयद बुरा लगा था उसको--
गुस्से में खिड़की के काँच पे
हत्थड़ मार के लौट गयी वह, दोबारा फिर
                   आयी नहीं -- --
खिड़की पर वह चटखा काँच अभी बाकी है!!

Sunday, 12 October 2014

सिगरेट

सिगरेट के धुयें से देखो
फेफड़े जल जायेंगे
खामखा उम्र के थोड़े साल गल जायेंगे

रोको मत

रोको मत
टोको मत

इन्हें सोचने दो
मुश्किलों के हल खोजने दो
रोको मत टोको मत
निकलने तो दो आसमां से जुड़ेंगे
अरे अंडे के अन्दर ही कैसे उड़ेंगे यार

सपना रे सपना

सपना रे सपना
है कोई अपना
अंखियों में आ भर जा
अंखियों की डिबिया
भर दे रे निंदिया
जादू से जादूकर जा

सपना रे सपना
है कोई अपना
अंखियों में आ भर जा ना