Friday, 29 November 2013

बड़ी तकलीफ होती है

मचल के जब भी आँखों से छलक जाते हैं दो आँसू
सुना है आबशारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

खुदारा अब तो बुझ जाने दो इस जलती हुई लौ को
चरागों से मज़ारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

कहू क्या वो बड़ी मासूमियत से पूछ बैठे है
क्या सचमुच दिल के मारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

तुम्हारा क्या तुम्हें तो राह दे देते हैं काँटे भी
मगर हम खांकसारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

आखिरी मौसम

हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है
बदलने वाला है मौसम
नये आवेज़े कानों में लटकते देख कर कोयल ख़बर देती है
बारी आम की आई
कि बस अब मौसम-ऐ-गर्मा शुरू होगा
सभी पत्ते गिरा के गुल मोहर जब नंगा हो जाता है गर्मी में
तो ज़र्द-ओ-सुर्ख़
सब्ज़े पर छपी
पोशाक की तैयारी करता है
पता चलता है कि बादल की आमद है
पहाड़ों से पिघलती बर्फ़ बहती है
धुलाने पैर 'पाइन' के
हवाएँ झाड़ के पत्ते उन्हें चमकाने लगती हैं
मगर जब रेंगने लगती है इन्सानों की बस्ती
हरी पगडन्डियों के पाँव जब बाहर निकलते हैं
समझ जाते हैं सारे पेड़
अब कटने की बारी आ रही है
यही बस आख़िरी मौसम है जीने का
इसे जी लो

सीधा सहल साफ है

किस क़दर सीधा सहल साफ़ है
यह रस्ता देखो
न किसी शाख़ का साया है
न दीवार की टेकन
किसी आँख की आहट
न किसी चेहरे का शोर
न कोई दाग़
जहाँ बैठ के सुस्ताए कोई
दूर तक कोई नहीं
कोई नहीं
कोई नहीं
चन्द क़दमों के निशाँ
हाँ
कभी मिलते हैं कहीं
साथ चलते हैं जो कुछ दूर
फ़क़त चन्द क़दम
और फिर टूट के गिरते हैं
यह कहते हुए
अपनी तनहाई लिये आप चलो
तन्हा अकेले
साथ आए जो यहाँ
कोई नहीं
कोई नहीं
किस क़दर सीधा
सहल साफ़ है यह रस्ता

वक़्त को आते न गुजरते देखा

वक़्त को आते न जाते न गुजरते देखा
न उतरते हुए देखा कभी इलहाम की सूरत
जमा होते हुए एक जगह मगर देखा है
शायद आया था वो ख़्वाब से दबे पांव ही
और जब आया ख़्यालों को एहसास न था
आँख का रंग तुलु होते हुए देखा जिस दिन
मैंने चूमा था मगर वक़्त को पहचाना न था
चंद तुतलाते हुए बोलों में आहट सुनी
दूध का दांत गिरा था तो भी वहां देखा
बोस्की बेटी मेरी
चिकनी-सी रेशम की डली
लिपटी लिपटाई हुई रेशम के तागों में
पड़ी थी
मुझे एहसास ही नहीं था कि वहां वक़्त पड़ा है
पालना खोल के जब मैंने उतारा था उसे बिस्तर पर
लोरी के बोलों से एक बार छुआ था उसको
बढ़ते नाखूनों में हर बार तराशा भी था
चूड़ियाँ चढ़ती-उतरती थीं कलाई पे मुसलसल
और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थी किताबें
मुझको मालूम नहीं था कि वहां वक़्त लिखा है
व्क़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा
जमा होते हुए देखा मगर उसको मैंने
इस बरस बोस्की अठारह बरस की होगी

तो यकी आये

चिपचिपे दूध से नहलाते है
आंगन में खड़ा कर के तुम्हें
शहद भी
तेल भी
हल्दी भी
ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं
गिलासियाँ भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी
जब धुआँ देता
लगातार पुजारी
घी जलाता है
कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो

चुपचाप

कैसे चुपचाप मर जाते हैं
कुछ लोग यहाँ
जिस्म की ठंडी सी
तारीक सियाह कब्र के अंदर
न किसी सांस की आवाज़
न सिसकी कोई
न कोई आह
न जुम्बिश
न ही आहट कोई
ऐसे चुपचाप ही मर जाते हैं
कुछ लोग यहाँ
उनको दफ़नाने की ज़हमत भी उठानी नहीं पड़ती

ख्वाब

देखो
आहिस्ता चलो
और भी आहिस्ता
ज़रा देखना
सोच सँभल कर
ज़रा पाँव रखना
ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं
कांच के ख़्वाब हैं
बिखरे हुए तन्हाई में
ख़्वाब टूटे न
कोई जाग न जाए देखो
जाग जाएगा कोई
ख़्वाब तो मर जाएगा

सांसों का कैदी

शहतूत की शाख़ पे बैठा कोई
बुनता है रेशम के तागे
लम्हा-लम्हा खोल रहा है
पत्ता-पत्ता बीन रहा है
एक-एक सांस बजा कर सुनता है सौदाई
एक-एक सांस को खोल के अपने तन पर लिपटाता जाता है
अपनी ही साँसों का क़ैदी
रेशम का यह शायर इक दिन
अपने ही तागों में घुट कर मर जाएगा

एक दिन

मैं उड़ते हुए पंछियों को डराता हुआ
कुचलता हुआ घास की कलगियाँ
गिराता हुआ गर्दनें इन दरख़्तों की
छुपता हुआ जिनके पीछे से
निकला चला जा रहा था वह सूरज
त'आक़ुब में था उसके मैं
गिरफ़्तार करने गया था उसे
जो ले के मेरी उम्र का एक दिन
भागता जा रहा था

तेरा कान्धा

चार तिनके उठा के जंगल से
एक बाली अनाज की लेकर
चंद कतरे बिलखते अश्कों के
चंद फांके बुझे हुए लब पर
मुट्ठी भर अपने कब्र की मिटटी
मुट्ठी भर आरजुओं का गारा
एक तामीर की लिए हसरत
तेरा खानाबदोश बेचारा
शहर में दर-ब-दर भटकता है
तेरा कांधा मिले तो टेकूं

खाली डिब्बा

खाली डिब्बा है फ़क़त
खोला हुआ चीरा हुआ
यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ
टकराता हुआ
बेवजह सड़कों पे बिखरा हुआ
फैलाया हुआ
ठोकरें खाता हुआ
खाली लुढ़कता डिब्बा
यूँ भी होता है
कोई खाली-सा
बेकार-सा दिन
ऐसा बेरंग-सा
बेमानी सा
बेनाम सा दिन