हवा के सींग ना पकड़ो खदेड़ देती है
जमी से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है
मैं चुप करता हूँ हर शब् उमड़ती बारिश को
मगर रोज ये गयी बात छेड़ देती है
जमीं सा दूसरा कोई सखी कहाँ होगा
ज़रा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है
रुंधे गले की दुआओं से भी नही खुलता
दर ए हयात जिसे मौत भेड़ देती है
Thursday, 4 February 2016
हवा के सींग ना पकड़ो
Thursday, 28 January 2016
पौधा
था तो सरसब्ज़
वो पौधा तो हरा था
और तन्दरूस्त थीं शाखें भी
मगर उसका कोई कद न निकल पाया था
बहुत साल सींचा भी गया
मेरे माली को शिकायत थी
कभी फूल न आये उस पर
और कई साल के बाद
मेरे माली ने खोद निकाला है जमीं से
सारे बागीचे में फैली हुई निकली हैं जड़ें
बरसों पाले हुए रिश्ते की तरह
जिसकी शाखें तो हरी रहती हैं लेकिन
उस पर फूल फल आते नहीं
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