Sunday, 15 June 2014

नज़र

नज़र में रहते हो
जब तुम नज़र नहीं आते

ये सुर बुलाते हैं
जब तुम इधर नहीं आते

इन लकीरों को ज़मी पर ही रहने दो
दिलों पे मत उतारो

सोने नही देते

कोई चादर की तरह खींचे चला जाता है दरिया
कौन सोया है तले इसके
जिसे ढूढ़ रहे हैं
डूबने वाले को भी चैन से सोने नही देते

धुल

ये माना इस दौरान कुछ साल बीत गये हैं
फिर भी आँखों में तुम्हारा चेहरा समाये हुए हैं
किताबों पे घूल जमने से कहानी कहाँ बदलती है

Wednesday, 11 June 2014

शौक

बहुत से लम्हे छोटे
बहुत छोटे होते हैं..
अक्सर खो जाते हैं..
मुझे शौक़ है उन्हें जमा करने का..

मौत

आंखें बंद करके सो गईं
और मर गईं
उसके बाद उसने सांस भी न ली
एक लंबी
हादसात से भरी
पेचदार जिंदग़ी के बाद
कितनी सीधी और सहल-सी मौत थी

1857

एक ख़याल था इन्क़लाब का,
सन १८५७
एक जज़्बा था, सन १८५७
एक घुटन थी, दर्द था, अंगारा था जो फूटा था
ड़ेढ़ सौ साल (१५०) हुए हैं

उसकी चुन चुन कर चिंगारियां हमने,
रोशनी की है
कितनी बार और कितनी जगह बीजी हैं वो चिंगारियां हमने
और उगाये हैं पौधे उस रोशनी के
हिंसा और अहिंसा से, कितने सारे जले अलाव

कानपुर, झांसी, लखनऊ, मेरठ, रूड़की, पटना
आज़ादी की पहली पहली जंग ने तेवर दिखलाये थे

पहली बार लगा था कि कोई सान्झा दर्द है,
बहता है
हाथ नहीं मिलते पर कोई उंगली पकड़े रह्ता है

पहली बार लगा था खून खौले तो रूह भी खौलती है

भूरे जिस्म की मट्टी में इस देश की मट्टी बोलती है

पहली बार हुआ था ऐसा,गांव गांव, रूखी रोटियां बंटती थी
और ठन्डे तन्दूर भड़क उठते थे

चन्द उड़ती हुई चिन्गारियों से सूरज का थाल बजा था जब
वो इन्क़लाब का पहला गज़र था, सन १८५७

गर्म हवा चलती थी जब
और बया के घोंसलों जैसी पेड़ों पर लाशें झूलती थीं

बहुत दिनो तक महरौली में, आग धुएं मे लिपटी रूहें
दिल्ली का रस्ता पूछती थीं
उस बार मगर कुछ ऐसा हुआ
क्रान्ति का अश्न तो निकला था

पर थामने वाला कोई ना था
जाम्बाज़ों के लश्कर पहुंचे मगर
सालारने वाला कोई ना था

कुछ यूं भी हुआ, मसनद से उठते देर लगी
और कोई न आया पांव की जूती सीधी करे

देखते देखते शाम-ए-अवध भी राख हुई

चालाक था रहज़न
रहबर को इस क़ू-ए-यार से दूर कहीं बर्मा में जाकर बांध दिया

काश कोई वो मट्टी लाकर अपने वतन मे दफ़्न करे

आज़ाद हैं अब,
अब तो वतन आज़ाद है अपना
अब तो सब कुछ अपना है

इस देश के सारी नदियों का पानी अपना है
लेकिन प्यास नहीं बुझती
ना जाने मुझे क्यूं लगता है
आकाश मेरा भर जाता है जब
कोई मेघ चुरा ले जाता है
हर बार उगाता हूं सूरज
खेतों को ग्रहण लग जाता है
अब तो वतन आज़ाद है मेरा

चिन्गारियां दो, चिन्गारियां दो
चिन्गारियां दो

मैं फिर से बीजूं और उगाऊं धूप के पौधे
रोशनी छिड़कूं जाकर अपने लोगों पर
वो मिल कर फिर से आवाज़ लगायें
इन्क़लाब! इन्क़लाब! इन्क़लाब!

प्रेमचंद

प्रेमचंद की सोहबत तो अच्छी लगती है
लेकिन उनकी सोहबत में तकलीफ़ बहुत है...

मुंशी जी आप ने कितने दर्द दिए हैं
हम को भी और
जिनको आप ने पीस पीस के मारा है
कितने दर्द दिए हैं आप ने हम को मुंशी जी

‘होरी’ को पिसते रहना
और एक सदी तक पोर पोर दिखलाते रहे हो
किस गाय की पूंछ पकड़ के बैकुंठ पार कराना था

सड़क किनारे पत्थर कूटते जान गंवा दी
और सड़क न पार हुई,
या तुम ने करवाई नही

‘धनिया’ बच्चे जनती, पालती
अपने और पराए भी
ख़ाली गोद रही आख़िर
कहती रही डूबना ही क़िस्मत में है तो
बोल गढ़ी क्या और गंगा क्या

'हामिद की दादी’ बैठी चूल्हे पर हाथ जलाती रही
कितनी देर लगाई तुमने एक चिमटा पकड़ाने में

'घीसू’ ने भी कूज़ा-कूज़ा उम्र की सारी बोतल पी ली
तलछट चाट के आखिर उसकी बुद्धि फूटी
नंगे जी सकते हैं तो फिर बिना कफ़न जलने में क्या है

'एक सेर इक पाव गंदुम’, दाना दाना सूद चुकाते
सांस की गिनती छूट गई है
तीन तीन पुश्तों को बंधुआ मज़दूरी में बांध के तुमने क़लम उठा ली
‘शंकर महतो’ की नस्लें अब तक वो सूद चुकाती हैं.

'ठाकुर का कुआँ’, और ठाकुर के कुएँ से एक लोटा पानी
एक लोटे पानी के लिए दिल के सोते सूख गए

'झोंकू’ के जिस्म में एक बार फिर ‘रायदास’ को मारा तुम ने

मुंशी जी आप विधाता तो न थे,
लेखक थे
अपने किरदारों की क़िस्मत तो लिख सकते थे?'

Tuesday, 10 June 2014

दो खुदा

सर्दी थी और कोहरा था
और सुबह की बस आधी आँख खुली थी,
आधी नींद में थी!

शिमला से जब नीचे आते
एक पहाड़ी के कोने में
बस्ते जितनी बस्ती थी इक
बटवे जितना मंदिर था
साथ लगी मस्जिद,
वो भी लॉकिट जितनी
नींद भरी दो बाहों
जैसे मस्जिद के मीनार गले में मन्दिर के,
दो मासूम खुदा सोए थे!
एक बूढ़े झरने के नीचे!!

तुझे पह्चानुगा कैसे

तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं
ढूँढा करता हूं तुम्हें
अपने चेहरे में ही कहीं
लोग कहते हैं
मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं

यूं तो लबरेज़ हैं पानी से
मगर प्यासी हैं
कान में छेद है
पैदायशी आया होगा
तूने मन्नत के लिये
कान छिदाया होगा
सामने दाँतों का वक़्फा है
तेरे भी होगा
एक चक्कर
तेरे पाँव के तले भी होगा
जाने किस जल्दी में थी
जन्म दिया, दौड़ गयी
क्या खुदा देख लिया था
कि मुझे छोड़ गयी
मेल के देखता हूं
मिल ही जाए तुझसी कहीं
तेरे बिन ओपरी लगती है
मुझे सारी जमीं
तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नही

Monday, 2 June 2014

खुदा राजी रहे

होंठ हिलते हैं भिखारी के,
सुनाई नहीं देता
हाथ के लफ़ज़ उछलते हैं,
वो कुछ बोल रहा है,
थपथपाता है हर इक कार का शीशा आकर
और उजलत में है
ट्रैफ़िक के सिग्नल पे नज़र है
चेंज है तो सही
कौन इस गर्मी में अब कार का शीशा खोले,
अगले सिगनल पे ही सही
रोज़ कुछ देना ज़रूरी है,
ख़ुदा राज़ी रहे

कहानी

कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का
दबा के पैन्सिल को उंगलियों में
मुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख के
लिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो..
ख़याल होता है, गोर्की है!

पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी है
जो म्यूनिसपैल्टी के पार्क में बैठ कर पढ़ा करते हैं किताबें
डिकेन्स के और हार्डी के नॉवेल से गिर पड़े हैं...
या प्रेमचन्द की कहानियों का वर्क है कोई,
चिपक गया है
समय पलटता नहीं वहां से
कहानी आगे बढ़ती नहीं है...
और कहानी रुकी हुई है
ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती हैं
बेस्वादी
हथेली पे लेके दिन की फक्की
मैं फाँक लेता हूं...
और निगलता हूं रात के ठन्डे घूंट पीकर
ये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता
ये खुश्क़ दिन एक गर्मियों का
जस भरी रात गर्मियों की

अफवाह

बुड़ बुड़ करते लफ्ज़ों को चिमटी से पकड़ो
फेंको
और मसल दो पैर की ऐड़ी से

अफ़वाहों को खूँ पीने की आदत है

कमाल

कहने वालों का कुछ नहीं जाता
सहने वाले कमाल करते हैं

कौन ढूंढे जवाब ज़ख्मों के
लोग तो बस सवाल करते हैं

भंवर सी

भंवर सी घूमती है ये ज़मीं, रोको

उतर के पूछ लूं आखिर मुझे जाना कहाँ तक है!

इसी स्टेशन पे ले आती है ये हर साल मुझको

और रोकती भी नहीं है

जहां जन्म की तारीख़ लिखी है

भंवर के दायरे गर फैल रहे हैं

तो फिर साहिल कहाँ हैं

सिमटता जा रहा है दायरा तो फिर

उम्र का मरकज़ कहाँ पर है

भंवर सी घूमती है ये ज़मीं, रोको

उतर के पूछ लूं आखिर मुझे जाना कहाँ तक है

गंगा मैया

सर, मुझे पहचाना क्या?

बारिश में कोई आ गया
कपड़े थे मुचड़े हुए और बाल सब भीगे हुए
पल को बैठा, फिर हँसा,
और बोला ऊपर देखकर

गंगा मैया आई थीं,मेहमान होकर
कुटिया में रह कर गईं
माइके आई हुई लड़की की मानिन्द
चारों दीवारों पर नाची
खाली हाथ अब जाती कैसे?

खैर से, पत्नी बची है
दीवार चूरा हो गई,
चूल्हा बुझा,जो था, नहीं था, सब गया

प्रसाद में पलकों के नीचे चार क़तरे रख गई है पानी के
मेरी औरत और मैं,

सर, लड़ रहे हैं
मिट्टी कीचड़ फेंक कर,
दीवार उठा कर आ रहा हूं!
जेब की जानिब गया था हाथ,
कि हँस कर उठा वो...

न न’, न पैसे नहीं सर,
यूंही अकेला लग रहा था
घर तो टूटा, रीढ़ की हड्डी नहीं टूटी मेरी...
हाथ रखिये पीठ पर
और इतना कहिये कि लड़ो...
बस!

तेरा नूर

ये सोना जो इतना चमक रहा है
अपनी किस्मत पे इतरा रहा है शायद
तेरे नूर के आगे फिर भी फीका है

कितनी गिरहें

कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
पांव मे पायल,
बाहों में कंगन,
गले मे हन्सली,
कमरबन्द,
छल्ले और बिछुए

नाक कान छिदवाये गये
और ज़ेवर ज़ेवर कहते कहते
रीत रिवाज़ की रस्सियों से मैं जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...

अब छिलने लगे हैं हाथ पांव,
और कितनी खराशें उभरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी रस्सियां उतरी हैं

कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं

अंग अंग मेरा रूप रंग
मेरे नक़्श नैन, मेरे भोले बैन
मेरी आवाज़ मे कोयल की तारीफ़ हुई
मेरी ज़ुल्फ़ शाम, मेरी ज़ुल्फ़ रात
ज़ुल्फ़ों में घटा, मेरे लब गुलाब
आँखें शराब
गज़लें और नज़्में कहते कहते
मैं हुस्न और इश्क़ के अफ़सानों में जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...

मैं पूछूं ज़रा, मैं पूछूं ज़रा
आँखों में शराब दिखी सबको,
आकाश नहीं देखा कोई
सावन भादौ तो दिखे मगर,
क्या दर्द नहीं देखा कोई

की झीनी सी चादर में
बुत छीले गये उरियानि के
तागा तागा करके पोशाक उतारी गयी
मेरे जिस्म पे फ़न की मश्क़ हुई
और आर्ट-कला कहते कहते
संगमरमर मे जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
बतलाए कोई, बतलाए कोई
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी ह

नज़्म

एक नज़्म मेरी
चोरी कर ली कल रात किसी ने
यहीं पड़ी थी बालकनी में
गोल तिपाही के ऊपर थी
व्हिस्की वाले ग्लास के नीचे रखी थी

नज़्म के हल्के हल्के
सिप मैं घोल रहा था होठों में

शायद कोई फोन आया था
अन्दर जाकर लौटा तो
फिर नज़्म वहां से गायब थी

अब्र के ऊपर नीचे देखा
सूट शफ़क़ की ज़ेब टटोली
झांक के देखा पार उफ़क़ के
कहीं नज़र ना आयी वो नज़्म मुझे

आधी रात आवाज़ सुनी तो
उठ के देखा
टांग पे टांग रख के आकाश में
चांद तरन्नुम में पढ़ पढ़ के
दुनिया भर को अपनी कह के
नज़्म सुनाने बैठा था

कल रात

गर्मी से कल रात अचानक आंख खुली तो
जी चाहा
कि स्विमिंग पूल के ठंडे पानी में
एक डुबकी मार के आऊं
बाहर आ के स्विमिंग पूल पे देखा तो
हैरान हुआ
जाने कब से से बिन पूछे
इक चांद आया
और मेरे पूल मे लेटा था
और तैर रहा था
उफ़्फ़
कल रात बहुत गर्मी थी

पीला चाँद

जब जब पतझड़ में
पेड़ों से पीले पीले पत्ते
मेरे लान मे आकर गिरते हैं

रात में छत पर जाकर
मैं आकाश को तकता रहता हूं
लगता है एक कमज़ोर सा पीला चांद भी शायद
पीपल के सूखे पत्ते सा लहराता लहराता मेरे लान में आकर उतरेगा

लिबास

कुछ खेलकूद में,
कुछ छीना झपटी में,
कुछ लड़ाई-झगड़े में कहीं
कहीं से
उसकी पोशाक़ फट गयी..
कहीं कहीं से सीवन उधड़ गयी..
लेकिन हर बार पुराना लिबास तो उतारना पड़ता है,

बहुत रात हुई..

बहुत रात हुई..
थक गया हूं,
मुझे सोने दो
चांद से कह दो उतर जाये
बहुत बात हुई

आशियां के लिये चार तिनके भी थे
आसरे रात के और दिन के भी थे
ढूंढते थे जिसे,
वो ज़रा सी ज़मीं
आसमां के तले खो गयी है कहीं
धूप से कह दो उतर जाये,
बहुत बात हुई

याद आता नहीं अब कोई नाम से
सब घरों के दिये बुझ गये शाम से
वक़्त से कह दो गुज़र जाये,
बहुत बात हुई

ज़िन्दगी के सभी रास्ते सर्द हैं
अजनबी रात के अजनबी दर्द हैं
याद से कह दो गुज़र जाये,
बहुत बात हुई
मैं थक गया हूं,
मुझे सोने दो,
बहुत रात हुई

चुनाव

पर्चियां बंट रही हैं
गलियों में
अपने क़ातिल का इन्तेख़ाब करो

वक़्त ये सख़्त है चुनाव का

बुदिया

बुढ़िया,
तेरे साथ तो मैंने,
जीने की हर शह बाँटी है!
दाना पानी, कपड़ा लत्ता, नींदें और जगराते सारे,
औलादों के जनने से बसने तक,
और बिछड़ने तक!
उम्र का हर हिस्सा बाँटा है
तेरे साथ जुदाई बाँटी,
रूठ, सुलह, तन्हाई भी
सारी कारस्तानियाँ बाँटी,
झूठ भी और सच भी,
मेरे दर्द सहे हैं तूने,
तेरी सारी पीड़ें मेरे पोरों में से गुज़री हैं,
साथ जिये हैं
साथ मरें ये कैसे मुमकिन हो सकता है ?
दोनों में से एक को इक दिन,
दूजे को शम्शान पे छोड़ के,
तन्हा वापिस लौटना होगा
बुढिया रे

खुदा

मैं जितनी भी ज़बानें जानता था
वो सारी आज़माईं हैं

ख़ुदा ने एक भी समझी नहीं अब तक..................

पढ़ा लिखा अगर होता खुदा अपना
न होती गुफ़्तगु तो कम से कम
चिट्ठी का आना जाना तो लगा रहता

शहरनामा

बम्बई

बड़ी लम्बी सी मछली की तरह
लेटी हुई पानी में ये नगरी
कि सर पानी में और पांव जमीं पर हैं
समन्दर छोड़ती है
ना समन्दर में उतरती है
ये नगरी बम्बई की......

यहां जीना भी जादू है
यहां पर ख्वाब भी टांगों पे चलते हैं
उमंगें फूटती हैं
जिस तरह पानी मे रक्खे मूंग के दाने
चटखते हैं तो जीभें उगने लगती हैं
यहां दिल खर्च हो जाते हैं
अक्सर कुछ नहीं बचता.....

मद्रास (चेन्नई)

शहर ये बुजुर्ग लगता है
फ़ैलने लगा है अब
जैसे बूढ़े लोगों का पेट बढ़ने लगता है
ज़बां के ज़ायके वही
लिबास के सलीके भी.........
ख़ुशकी बढ़ गयी है जिस्म पर
’कावेरी’ सूखी रहती है

कोलकता

कभी देखा है बिल्डिंग में
किसी सीढ़ी के नीचे
जहां मीटर लगे रहते हैं
बिजली केपुराने जंग आलूदा...

खुले ढक्कन के नीचे पान खाये मैले दांतों की तरह
कुछ फ़्यूज़ रक्खे हैं...
बेहया बदमाश लड़के की तरह वो
खिलखिला के हंसता रहता है

दिल्ली

पुरानी दिल्ली की दोपहर
लू से झुलसी दिल्ली की दोपहर में अक्सर
चारपाई बुनने वाला जब
घंटा घर वाले नुक्कड़ से
कान पे हाथ रख कर
इक हांक लगता था
चार पाई बनवा लो...

खसखस कि टट्यों में सोये लोग अन्दाज़ा लगा लेते थे..
डेढ़ बजा है..
दो बजते बजते जामुन वाला गुजरेगा
जामुन.. ठन्डे.. काले जामुन...

तुम्हारा शहर

तुम्हारे शहर में ए दोस्त
क्यूं कर च्युंटियों के घर नहीं हैं
कहीं भी चीटियां नहीं देखी मैने
अगरचे फ़र्श पे चीनी भी डाली
पर कोइ चीटीं नज़र नहीं आयी

हमारे गांव के घर में तो आटा डालते हैं
गर
कोइ क़तार उनकी नज़र आये....

तुम्हारे शहर में गरचे..
बहुत सब्ज़ा है,
कितने खूबसूरत पेड़ हैं
पौधे हैं,
फूलों से भरे हैं
कोई भंवरा मगर देखा नहीं
भंवराये उन पर......

मेरा गांव बहुत पिछड़ा हुआ है
मेरे आंगन के बरगद पर
सुबह कितनी तरह के पंछी आते हैं
वे नालायक,
वहीं खाते हैं दाना
और वहीं पर बीट करते हैं

तुम्हारे शहर में लेकिन
हर इक बिल्डिंग,
इमारत खूबसूरत है,
बुलन्द है
बहुत ही खूबसूरत लोग मिलते हैं
मगर ए दोस्त जाने क्यों..
सभी तन्हा से लगते हैं
तुम्हारे शहर में कुछ रोज़ रह लूं
तो बड़ा सुनसान लगता है..

एक हसरत

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन,
हर रोज़ मिलता है
मगर
हर रोज़ कोइ छीन लेता है,
झपट लेता है अण्टी से

कभी खीसे से गिर पढ़ता है
तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,

खरे दिन को भी मैं खोटा समझ के भूल जाता हूं

गिरेबान से पकड़ के मांगने वाले भी मिलते हैं
तेरी गुज़री हुई पुश्तों का कर्ज़ा है
तुझे किश्तें चुकानी हैं

ज़बर्दस्ती कोई गिरवी भी रख लेता है
ये कह कर
अभी दो चार लम्हे खर्च करने के लिये रख ले
बक़ाया उम्र के खाते में लिख देते हैं
जब होगा
हिसाब होगा

बड़ी हसरत है पूरा एक दिन
इक बार मैं
अपने लिये रख लूं

तुम्हारे साथ पूरा एक दिन
बस खर्च करने कि तमन्ना है

ऐश ट्रे

बहुत से आधे बुझे हुए दिन पड़े हैं इसमे
बहुत से आधे जले हुई रात गिर पड़ी हैं
ये एश-ट्रे भरती जा रही है

फिर तलब

फिर तलब
है तलब...
बेसबब
है तलब
शाम होने लगी है
लाल होने लगी है
जब भी सिगरेट जलती है,
मैं जलता हूं
आग पे पाँव पड़ता है
कमबख़्त धुएं में चलता हूं

फिर किसी ने जलाई
एक दिया सलाई
आसमां जल उठा है
शाम ने राख उड़ायी

उपले जैसे जलता हूं
कम्बख्त धुएं में चलता हूं

धागे धुएं के सांस सिलने लगे हैं
प्यास उधड़ी हुई है
होठ छिलने लगे हैं
शाम होने लगी है
लाल होने लगी है
ज़िन्दगी की शाम
खून की लाली