Thursday, 4 February 2016

हवा के सींग ना पकड़ो

हवा के सींग ना पकड़ो खदेड़ देती है
जमी से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है
मैं चुप करता हूँ हर शब् उमड़ती बारिश को
मगर रोज ये गयी बात छेड़ देती है
जमीं सा दूसरा कोई सखी कहाँ होगा
ज़रा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है
रुंधे गले की दुआओं से भी नही खुलता
दर ए हयात जिसे मौत भेड़ देती है