Sunday, 23 November 2014

छाता

सर पे रखते थे
जहाँ धूप थी, बारिश थी
घर पे देहलीज़ के बाहर ही
मुझे छोड़ दिया

नज़र

कुछ नज़र आता नहीं
इस बात का ग़म है
अब हमारी आँख में भी
रौशनी कम है

इतिहास

अकबर का लोटा रखा है शीशे की अलमारी में
रना के "चेतक" घोड़े की एक लगाम
जैमल सिंह पर जिस बंदूक से अकबर ने
दाग़ी थी गोलीरखी है !

शिवाजी के हाथ का कब्जा
"त्याग राज" की चौकी, जिस पर बैठ के रोज़
रियाज़ किया करता था वो
"थुन्चन" की लोहे की कलम है
और खड़ाऊँ "तुलसीदास" की
"खिलजी" की पगड़ी का कुल्ला...

जिन में जान थी, उन सब का देहांत हुआ
जो चीज़ें बेजान थीं, अब तक ज़िन्दा हैं !!

Saturday, 22 November 2014

शायद

दिल में कुछ जलता है
शायद धुआं धुआं सा लगता है
आंख में कुछ चुभता है
शायद सपना कोई सुलगता है

निर्भया

निर्भया
आग लगे तो शायद अँधेरा पिघले
तेरी चिता की कोख से जब सूरज निकले

तसव्वुर

कितनी आवाजें हैं
ये लोग हैं
बातें हैं
मगर
ज़ेहन के पीछे
किसी और सतह पे
कहीं जैसे चुपचाप
बरसता है
तसव्वुर तेरा

मैं

कुछ भी कायम नही है
कुछ भी नही
और जो कायम है
एक बस मैं हूँ
मैं
जो पल पल बदलता रहता हूँ

खुशबु

पत्थर की दीवार पे
लकड़ी की एक फ्रेम में
कांच के अंदर फूल बने हैं
एक तसस्वुर खुशबु का
और कितने सारे पहनावों में बंद किया है

उचाईयां

यहाँ सारे चेहरे हैं मांगे हुए से
निगाहों में आंसू भी टांगे हुए से
बड़ी नीची राहें हैं
उचाईयों की

नींद

इक निवाले सी निगल जाती है
ये नींद मुझे
रेशमी मोज़े निगल जाते हैं पांव जैसे
सुबह लगता है के
ताबूत से निकला हूँ अभी

दर्द हल्का है

दर्द हल्का है
साँस भारी है
जिए जाने की रस्म जारी है
आपके बाद हर घडी हमने
आपके साथ ही गुजारी है

साँस मिले

दफन कर दो हमें
के साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है

हार

ऐसे बिखरे हैं रात दिन
जैसे मोतियों वाला हार टूट गया

तुमने मुझको पिरो के रखा था

आप के बाद

आप के बाद ये महसूस हुआ है हमको
जीना मुश्किल नही
और मरना भी दुश्वार नही

दुआ करो

दुआ करो
अजीब सा अमल है ये
ये एक फर्जी गुफ्तगू
और एकतरफा
एक ऐसे शख्स से
ख़याल जिसकी शक्ल है
ख्याल ही सबूत है

कल का डर भी नहीं

आज बिछड़े हैं
कल का डर भी नहीं
जिन्दगी इतनी मुख़्तसर भी नहीं

जख्म दिखते नहीं अभी लेकीन
ठंडे होंगे तो दर्द निकलेगा

ऐश उतरेगा वक्त का जब भी
चेहरा अन्दर से जर्द निकलेगा

कहनेवालों का कुछ नहीं जाता
सहने वाले कमाल करते हैं

कौन ढूंढें जवाब दर्दों के
लोग तो बस सवाल करते हैं

कल जो आयेगा जाने क्या होगा
बीत जाए जो कल नहीं आते

वक्त की शाख तोड़ने वालों
टूटी शाखों पे फल नहीं आते

कच्ची मिट्टी हैं
दिल भी इंसान भी
देखने ही में सख्त लगता हैं

आँसू पोछे तो आँसुओं के निशाँ
खुश्क होने में वक्त लगता है

एक सुबह

एक सुबह इक मोड़ पर
मैने कहा उसे रोक कर

हाथ बढ़ा ए ज़िंदगी
आँख मिला के बात कर

रोज़ तेरे जीने के लिये
इक सुबह मुझे मिल जाती है

मुरझाती है कोई शाम अगर
तो रात कोई खिल जाती है

मैं रोज़ सुबह तक आता हूं
और रोज़ शुरु करता हूं सफ़र

हाथ बढ़ा ए ज़िंदगी
आँख मिला के बात कर

तेरे हज़ारों चेहरों में
एक चेहरा है,
मुझ से मिलता है

आँखो का रंग भी एक सा है
आवाज़ का अंग भी मिलता है

सच पूछो तो हम दो जुड़वां हैं

तू शाम मेरी,
मैं तेरी सहर

हाथ बढ़ा ए ज़िंदगी
आँख मिला के बात कर

मैने कहा उसे रोक कर..

देर कर दी दोस्त

बे यारो मददगार ही काटा था सारा दिन
कुछ खुद से अजनबी सा
तन्हा उदास सा
साहिल पे दिन बुझा के मैं
लौट आया फिर वहीँ
सुनसान सी सड़क के खाली मकान में

दरवाज़ा खोलते ही
मेज़ पे रखी किताब ने हलके से फडफडा के कहा

देर कर दी दोस्त....

शक्ल

इक नक़्ल तुझे भी भेजूंगा
ये सोच के ही
तन्हाई के नीचे
कार्बन पेपर रख के मैं
ऊँची ऊँची आवाज़ में बातें करता हूँ

अल्फाज़ उतर आते हैं कागज़ पे लेकिन
आवाज़ की शक्ल उतरती नही
रातों की सियाही दिखती है....

सिद्धार्थ

कोई पत्ता भी नहीं हिलता
ना परदों में है जुम्बिश
फिर भी कानों में बहुत तेज़ हवाओं की सदा है कितने ऊँचे हैं ये मेहराब महल के
और मेहराबों से ऊँचा वो सितारों से भरा थाल फलक का
कितना छोटा है मेरा कद...
फर्श पर जैसे किसी हर्फ़ से नुक्ता गिर हो
सैंकड़ों संतों में भटका हुआ मन ठहरे जरा
दिल धडकता है तो बस दौड़ती टापों की सदा आती है
रौशनी बंद भी कर देने से क्या होगा अँधेरा?
सिर्फ आंखें ही नहीं देख सकेंगी ये चौगर्दा
मैं अगर कानों में कुछ ठूंस भी लूं
रौशनी चिंता की तो जेहन से अब बुझ नहीं सकती
ख़ुदकुशी एक अँधेरा है
उपाय तो नहीं
खिड़कियाँ साडी खुली हैं तो हवा क्यूँ नही आती?
नीचे सर्दी है बहुत
और हुआ तुण्ड है शायद
दूर दरवाज़े के बाहर खड़े वो संतरी दोनों
शाम से आग में बीएस सूखी हुई टहनियों को झोंक रहे हैं
मेरी आँखों से वो सूखा हुआ ढांचा नहीं गिरता
जिस्म ही जिस्म तो था
रूह कहाँ थी उसमें
कोढ़ था उसको
तपेदिक था?
ना जाने क्या था?
या बुढापा ही था शायद...
पसलियाँ सूखे हुए केक्रों के शाख्चे जैसे
रथ पे जाते हुए देखा था
चट्टानों से उधर...
अपनी लाठी पे गिरे पेड़ की मानिंद खड़ा था
फिर यकायक ये हुआ
सारथी
रोक नहीं पाया था मुंहजोर समय की टापें
रथ के पहिये के तले
देखा तड़प कर इसे ठंडा होते
ख़ुदकुशी थी?
वो समर्पण था?
वो दुर्घटना थी?
क्या था?
सब्ज़ शादाब दरख्तों के वजूद
अपने मौसम में बिन मांगे भी फल देते हैं
सूख जाते हैं तो सब काट के
इसी आग में ही झोंक दिए जाते हैं
जैसे दरवाज़े पे आमाल के वो दोनों फ़रिश्ते
शाम से आग में बस सूखी हुई टहनियों को झोंक रहे हैं...