Saturday, 14 September 2013

वो जो शायर था

वो जो शायर था चुप-सा रहता था

बहकी-बहकी-सी बातें करता था

आँखें कानों पे रख के सुनता था

गूँगी खामोशियों की आवाज़ें

जमा करता था चाँद के साए

और गीली- सी नूर की बूँदें

रूखे-रूखे- से रात के पत्ते

ओक में भर के खरखराता था

वक़्त के इस घनेरे जंगल में

कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था

हाँ वही,

वो अजीब सा शायर

रात को उठ के कोहनियों के बल

चाँद की ठोड़ी चूमा करता था

चाँद से गिर के मर गया है वो

लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है

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