Friday, 17 October 2014

छोड़ आए हम वो गलियां

जहां तेरे पैरों के कँवल गिरा करते थे
हँसे तो दो गालों में भँवर पड़ा करते थे
तेरी कमर के बल पे नदी मुड़ा करती थी
हंसी को सुनके तेरी फ़सल पका  करती थी

छोड़ आए हम वो गलियां 


जहाँ  तेरी एड़ी से धूप उड़ा करती थी
सुना है उस चौखट पे अब शाम रहा करती है
लटों से उलझी लिपटी रात  एक  हुआ करती थी
कभी कभी तकिये पे वो भी मिला करती है

छोड़ आए हम वो गलियां  


 

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