Friday, 28 February 2014

सूरज फिर से जलने लगे

बस
चन्द करोड़ों सालों में
सूरज की आग बुझेगी जब

और राख उड़ेगी सूरज से
जब कोई चाँद न डूबेगा

और कोई जमीं न उभरेगी

तब ठंढा बुझा इक कोयला सा
टुकड़ा ये जमीं का घूमेगा

भटका भटका
मद्धम की सी रोशनी में

मैं सोचता हूँ
उस वक्त अगर
कागज़ पे लिखी इक नज़्म कहीं उड़ते उड़ते
सूरज में गिरे
तो सूरज फिर से जलने लगे

No comments:

Post a Comment