कहीं न कहीं जाकर चीज़ें इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं और उसे बनने देना चाहिए न कि हर बार उन्हें झाड़-पोंछकर, खुरचकर बाहर निकालें. ख़राशों को नाख़ूनों से खरोंचा न जाए तो ही बेहतर है क्योंकि ये ज़ख़्म भर चुके हैं और उन्हें भरने देना चाहिए
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