इक नक़्ल तुझे भी भेजूंगा ये सोच के ही तन्हाई के नीचे कार्बन पेपर रख के मैं ऊँची ऊँची आवाज़ में बातें करता हूँ
अल्फाज़ उतर आते हैं कागज़ पे लेकिन आवाज़ की शक्ल उतरती नही रातों की सियाही दिखती है....
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