बे यारो मददगार ही काटा था सारा दिन कुछ खुद से अजनबी सा तन्हा उदास सा साहिल पे दिन बुझा के मैं लौट आया फिर वहीँ सुनसान सी सड़क के खाली मकान में
दरवाज़ा खोलते ही मेज़ पे रखी किताब ने हलके से फडफडा के कहा
देर कर दी दोस्त....
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