कोई पत्ता भी नहीं हिलता
ना परदों में है जुम्बिश
फिर भी कानों में बहुत तेज़ हवाओं की सदा है कितने ऊँचे हैं ये मेहराब महल के
और मेहराबों से ऊँचा वो सितारों से भरा थाल फलक का
कितना छोटा है मेरा कद...
फर्श पर जैसे किसी हर्फ़ से नुक्ता गिर हो
सैंकड़ों संतों में भटका हुआ मन ठहरे जरा
दिल धडकता है तो बस दौड़ती टापों की सदा आती है
रौशनी बंद भी कर देने से क्या होगा अँधेरा?
सिर्फ आंखें ही नहीं देख सकेंगी ये चौगर्दा
मैं अगर कानों में कुछ ठूंस भी लूं
रौशनी चिंता की तो जेहन से अब बुझ नहीं सकती
ख़ुदकुशी एक अँधेरा है
उपाय तो नहीं
खिड़कियाँ साडी खुली हैं तो हवा क्यूँ नही आती?
नीचे सर्दी है बहुत
और हुआ तुण्ड है शायद
दूर दरवाज़े के बाहर खड़े वो संतरी दोनों
शाम से आग में बीएस सूखी हुई टहनियों को झोंक रहे हैं
मेरी आँखों से वो सूखा हुआ ढांचा नहीं गिरता
जिस्म ही जिस्म तो था
रूह कहाँ थी उसमें
कोढ़ था उसको
तपेदिक था?
ना जाने क्या था?
या बुढापा ही था शायद...
पसलियाँ सूखे हुए केक्रों के शाख्चे जैसे
रथ पे जाते हुए देखा था
चट्टानों से उधर...
अपनी लाठी पे गिरे पेड़ की मानिंद खड़ा था
फिर यकायक ये हुआ
सारथी
रोक नहीं पाया था मुंहजोर समय की टापें
रथ के पहिये के तले
देखा तड़प कर इसे ठंडा होते
ख़ुदकुशी थी?
वो समर्पण था?
वो दुर्घटना थी?
क्या था?
सब्ज़ शादाब दरख्तों के वजूद
अपने मौसम में बिन मांगे भी फल देते हैं
सूख जाते हैं तो सब काट के
इसी आग में ही झोंक दिए जाते हैं
जैसे दरवाज़े पे आमाल के वो दोनों फ़रिश्ते
शाम से आग में बस सूखी हुई टहनियों को झोंक रहे हैं...
Saturday, 22 November 2014
सिद्धार्थ
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