Saturday, 7 March 2015

हाँ आवारा हूँ

हाँ,आवारा हूँ
जमीं पे चलते,छलकते,बहते दरिया की धारा हूँ
यहाँ का,वहाँ का,कहीं का नहीं
दिशाओं का मारा हूँ

कभी लोहित किनारे से मिसिसिपी हो के वोल्गा की बात सुनी
ओटावा हो के आस्ट्रिया होते पेरिस की रात चूनी
मैंने एलोरा के सारे रंग शिकागो में जा उडाए
और ग़ालिब के श़ेर बुखारा के मीनारों पे गुनगुनाये
मार्क ट्वेन की समाधि पे गोर्की के हाल कहे
रास्तों के,गलियों के,लोगों का प्यारा हूँ

जहाँ कहीं देखे जिंदगी के रंग
वहीं ठहर गया
आवारगी में आवारगी को मंजिल बना लिया
मैंने देखी है कहीं गगनचुम्बी ऊँची अटारी
और खाक छानती देखी है वहीँ जिंदगी बेचारी
कहीं देखी है चौखटों पर झूलती फुलवारी
मुरझाई कहीं,खिल न सकी
इक कली बेचारी
मैंने देखे हैं जमीं पे कई बुझते हुए सूरज
जलता है जो आकाश में
रात का तारा हूँ

हाँ,आवारा हूँ

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