रात और दिन कितने खूबसूरत दो वक़्त हैं,
और कितने खूबसूरत दो लफ्ज़
इन दो लफ़्ज़ों के बीच में
एक वक़फ़ा आता है
जिसे शाम का वक़्त कहते हैं
ये वो वक़्त है
जिसे न रात अपनाती है
न दिन अपने साथ लेकर जाता है
इस छोड़े हुए
या छूटे हुए लावारिस वक़्त से
शायर अक्सर कोई न कोई लम्हा चुन लेता है
और सी लेता है अपने शेरों में
लेकिन कोई-कोई शाम भी ऐसी बाँझ होती है
के कोई लम्हा देकर नहीं जाती
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