Wednesday, 11 March 2015

तुम

मटका भरके सूरज उल्टा
शाम ने दूर समंदर की दहलीज पे जाकर
रात का पश्मीना पहने तुम आई थीं

रात तुम्हारे जिस्म से फिसली पड़ती थी
जिस्म तुम्हारा एक जलते सय्यारे सा
दूध और धूप से गूंधी मिट्टी
एक फ़लक भर खुश्बू थी आवाज़ तुम्हारी

तुम बोल रही थीं
होंठ तुम्हारे चाँद की काशें काट रहे थे
मैं हैरां ...
हैरां हैरां ...

मटका भर के सूरज का
एक और सहर निकली पानी से
उँगली थाम के सुबह की तुम पानी पर चलते-चलते एक और उफ़क को लौट गईं

वक़्त के पुरइसरार किसी 'कॉमेट' की तरह
क़ायनात से आईं तुम और क़ायनात में लौट गईं

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