तुम लोगो के कद क्यों छोटे रह जाते हैँ?
आओ हाथ पकड़ लो मेरा
पसलियों पे पांव रखो
ऊपर आ जाओ
आओ ठीक से चेहरा तो देखूँ तुम्हारा
कैसे लगते हो
जैसे मेरी अलग अलग चींटियों को तुम पहचान नहीं सकते
वैसे ही मुझको तुम सब एक से लगते हो
बस एक ही फर्क है
मेरी कोई चींटी बदन पे चढ़ जाये तो चुटकी से पकड़ कर मार दिया करते हो तुम
मैं ऐसा नही करता
कह देते हो कहने को तुम
लेकिन अपने बड़ों की इज्जत नहीं करते
इसलिए इतने छोटे रह जाते हो तुम
इतना अकेला नही हूँ मैं तुम जितना समझते हो
तुम ही लोग हो भीड़ में रहकर भी तन्हा रहते हो
भरे हुए काफिले जब बादलों के जाते हैं
झप्पियां डाल के जाते हैं मुझे
दरिया भी उतरते है तो पांव छू के विदा होते हैं
मौसम मेरे मेहमाँ हैं
आते हैं तो महीनों रह के जाते हैं
देखता हूँ कितनी छोटी उम्रों में तुम मिलते बिछड़ते हो ख्वाहिशें और उम्मीदे भी छोटी छोटी
इसलिए क्या तुम्हारे कद इतने छोटे रह जाते हैं?
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