Friday, 15 December 2017

पुस्तक

एक बार सोचा पुस्तक ने
टीचर से भी कुट्टी हो
रोज़ हमें पढ़ते हैं बच्चे
अपनी भी तो छुट्टी हो

शब्दों ने भी साथ दिया
अब बोले सारे दौड़ चलो
पुस्तक वुस्तक पाठ वाठ से
रिश्ते सारे तोड़ चलो

नल से पानी बहते बहते
नाला हुआ है नाली का
रोज यही कहती है टीचर
नल पर जा, जा पानी ला

पिछली डेस्क पर बैठे बैठे
बच्चे सारे सोते हैं
टीचर कहती ही रहती है
पेड़ पर कितने तोते हैं

फाड़े, फेंके जब कोई पुस्तक
आवाज़ तो करती है
ले जाएगा खोमचे वाला
बस इस बात से डरती है

कपड़े भी फटते हैं सबके
जूते भी घिस जाते हैं
बोल बोल के शब्द भी आखिर
दांतों में पिस जाते हैं

ठीक ही सोचा पुस्तक ने
टीचर से भी तो कुट्टी हो
रोज़ ही पढ़ते हैं बच्चे
इनकी भी तो छुट्टी हो

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