एक बार सोचा पुस्तक ने
टीचर से भी कुट्टी हो
रोज़ हमें पढ़ते हैं बच्चे
अपनी भी तो छुट्टी हो
शब्दों ने भी साथ दिया
अब बोले सारे दौड़ चलो
पुस्तक वुस्तक पाठ वाठ से
रिश्ते सारे तोड़ चलो
नल से पानी बहते बहते
नाला हुआ है नाली का
रोज यही कहती है टीचर
नल पर जा, जा पानी ला
पिछली डेस्क पर बैठे बैठे
बच्चे सारे सोते हैं
टीचर कहती ही रहती है
पेड़ पर कितने तोते हैं
फाड़े, फेंके जब कोई पुस्तक
आवाज़ तो करती है
ले जाएगा खोमचे वाला
बस इस बात से डरती है
कपड़े भी फटते हैं सबके
जूते भी घिस जाते हैं
बोल बोल के शब्द भी आखिर
दांतों में पिस जाते हैं
ठीक ही सोचा पुस्तक ने
टीचर से भी तो कुट्टी हो
रोज़ ही पढ़ते हैं बच्चे
इनकी भी तो छुट्टी हो
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