Friday, 23 January 2015

अच्छा खयाल है

उम्र कितनी खूबसूरती से उतरती है चेहरे पे
और कितने खुबसुरत निशान बनाती है

आहिस्ता आहिस्ता आपकी पेशानी खोल देती है
आँखों के पास कोनों में लकीरें खींचती रहती है
और फिर उन्हें आहिस्ता आहिस्ता और गहरा करती रहती है

आंसू इक अपनी धार बना लेता है
एक अपनी लकीर खीचता हुआ
रुखसारों से गुज़र जाता है

उम्र के निशान ही तो हैं वो सारे

वो आहिस्ता आहिस्ता आपके चेहरे का एक खाका बनाते हैं
जो खुबसूरत से खुबसुरततर होता चला जाता है

लेकिन उम्र का ये सफर दो तरफा है
जैसे जैसे आगे बढती जाती है उमर
पीछे की तस्वीरें सामने आने लगती हैं

कई बार जी चाहता है कि
अपने माज़ी से जा के फिरसे मिला जाए
या फिर
अपने माज़ी को सामने ले लें
उसके साथ साथ चलें

मैं कभी मुड़ के देखता हूँ तो
मुझे बाज़ार से कटती हुई एक पतली सी गली नज़र आती है

स्कूल से भागा हुआ एक लड़का नज़र आता है
जिसे टीचर्स अच्छे नही लगते थे
वो एक गिलहरी को अपनी किताब की तस्वीरें दिखा के बहुत खुश होता था

इमली के पेड़ से टंगी कटी हुई पतंग
उसकी लटकी हुई डोर
कभी हाथ आती है
कभी नही आती

एक दिन तो मैं भी बूढ़ा होऊंगा

अच्छा खयाल है

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