नाराज़ है मुझसे
बोस्की शायद
जिस्म का एक अंग चुप चुप सा है
सूजे से लगते है पांव
सोच में एक भंवर की आँख है
घूम घूम कर देख रही है बोस्की
सूरज का टुकड़ा है मेरे खून में
रात और दिन घुलता रहता है
वह क्या जाने,
जब वो रूठे
मेरी रगों में खून की गर्दिश मद्धम पड़ने लगती है.
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