Wednesday, 12 June 2013

बोस्की

नाराज़ है मुझसे
बोस्की शायद

जिस्म का एक अंग चुप चुप सा है

सूजे से लगते है पांव

सोच में एक भंवर की आँख है

घूम घूम कर देख रही है बोस्की

सूरज का टुकड़ा है मेरे खून में

रात और दिन घुलता रहता है

वह क्या जाने,

जब वो रूठे

मेरी रगों में खून की गर्दिश मद्धम पड़ने लगती है.

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