Saturday, 15 June 2013

मेरी दहलीज़ पर

मेरी दहलीज़ पर बैठी हुयी

जानो पे सर रखे

ये शब अफ़सोस करने आई है

कि मेरे घर पे आज ही जो मर गया है दिन

वह दिन हमजाद था उसका

वह आई है

कि मेरे घर में उसको दफ्न कर के,

इक दीया दहलीज़ पे रख कर,

निशानी छोड़ दे कि मह्व है ये कब्र,

इसमें दूसरा आकर नहीं लेटे

मैं शब को कैसे बतलाऊँ,

बहुत से दिन मेरे आँगन में

यूँ आधे अधूरे से कफ़न ओढ़े पड़े हैं

कितने सालों से,

जिन्हें मैं आज तक दफना नही पाया

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