Saturday, 15 June 2013

बहुत दिन हो गए

मैं
कुछ-कुछ भूलता जाता हूँ अब तुझको,
तेरा चेहरा भी अब धुँधलाने लगा है
अब तखय्युल में,
बदलने लग गया है अब यह सुब-हो-शाम का मामूल,
जिसमें तुझसे मिलने का ही इक मामूल शामिल था तेरे खत आते रहते थे
तो मुझको याद रहते थे तेरी आवाज़ के सुर भी तेरी आवाज़ को कागज़ पे रखके
मैंने चाहा था कि pin कर लूँ,
वो जैसे तितलिओं के पर लगा लेता है कोई
अपनी अलबम में
तेरा 'बे' को दबा कर बात करना,
Wow पर होठों का छल्ला गोल होकर घूम जाता था
बहुत दिन हो गए देखा नहीं,
ना खत मिला कोई
बहुत दिन हो गए सच्ची
तेरी आवाज़ की बौछार में भीगा नहीं हूँ मैं

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