Thursday, 13 June 2013

मैं यहाँ तन्हा हूँ

रात में
जब भी मेरी आँख खुले
नंगे पाँव ही निकल जाता हूँ
कहकशाँ छू के निकलती है जो इक पगडंडी
अपने पिछवाड़े के सन्तुरी सितारे की तरफ़
दूधिया तारों पे पाँव रखता चलता रहता हूँ
यही सोच के मैं कोई सय्यारा अगर जागता मिलजाए कहीं
इक पड़ोसी की तरह पास बुला ले शायद
और कहे
आज की रात यहीं रह जाओ
तुम जमीं पर हो अकेले
मैं यहाँ तन्हा हूँ.

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