Monday, 2 June 2014

शहरनामा

बम्बई

बड़ी लम्बी सी मछली की तरह
लेटी हुई पानी में ये नगरी
कि सर पानी में और पांव जमीं पर हैं
समन्दर छोड़ती है
ना समन्दर में उतरती है
ये नगरी बम्बई की......

यहां जीना भी जादू है
यहां पर ख्वाब भी टांगों पे चलते हैं
उमंगें फूटती हैं
जिस तरह पानी मे रक्खे मूंग के दाने
चटखते हैं तो जीभें उगने लगती हैं
यहां दिल खर्च हो जाते हैं
अक्सर कुछ नहीं बचता.....

मद्रास (चेन्नई)

शहर ये बुजुर्ग लगता है
फ़ैलने लगा है अब
जैसे बूढ़े लोगों का पेट बढ़ने लगता है
ज़बां के ज़ायके वही
लिबास के सलीके भी.........
ख़ुशकी बढ़ गयी है जिस्म पर
’कावेरी’ सूखी रहती है

कोलकता

कभी देखा है बिल्डिंग में
किसी सीढ़ी के नीचे
जहां मीटर लगे रहते हैं
बिजली केपुराने जंग आलूदा...

खुले ढक्कन के नीचे पान खाये मैले दांतों की तरह
कुछ फ़्यूज़ रक्खे हैं...
बेहया बदमाश लड़के की तरह वो
खिलखिला के हंसता रहता है

दिल्ली

पुरानी दिल्ली की दोपहर
लू से झुलसी दिल्ली की दोपहर में अक्सर
चारपाई बुनने वाला जब
घंटा घर वाले नुक्कड़ से
कान पे हाथ रख कर
इक हांक लगता था
चार पाई बनवा लो...

खसखस कि टट्यों में सोये लोग अन्दाज़ा लगा लेते थे..
डेढ़ बजा है..
दो बजते बजते जामुन वाला गुजरेगा
जामुन.. ठन्डे.. काले जामुन...

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