मैं जितनी भी ज़बानें जानता था वो सारी आज़माईं हैं
ख़ुदा ने एक भी समझी नहीं अब तक..................
पढ़ा लिखा अगर होता खुदा अपना न होती गुफ़्तगु तो कम से कम चिट्ठी का आना जाना तो लगा रहता
No comments:
Post a Comment