Monday, 2 June 2014

फिर तलब

फिर तलब
है तलब...
बेसबब
है तलब
शाम होने लगी है
लाल होने लगी है
जब भी सिगरेट जलती है,
मैं जलता हूं
आग पे पाँव पड़ता है
कमबख़्त धुएं में चलता हूं

फिर किसी ने जलाई
एक दिया सलाई
आसमां जल उठा है
शाम ने राख उड़ायी

उपले जैसे जलता हूं
कम्बख्त धुएं में चलता हूं

धागे धुएं के सांस सिलने लगे हैं
प्यास उधड़ी हुई है
होठ छिलने लगे हैं
शाम होने लगी है
लाल होने लगी है
ज़िन्दगी की शाम
खून की लाली

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