भंवर सी घूमती है ये ज़मीं, रोको
उतर के पूछ लूं आखिर मुझे जाना कहाँ तक है!
इसी स्टेशन पे ले आती है ये हर साल मुझको
और रोकती भी नहीं है
जहां जन्म की तारीख़ लिखी है
भंवर के दायरे गर फैल रहे हैं
तो फिर साहिल कहाँ हैं
सिमटता जा रहा है दायरा तो फिर
उम्र का मरकज़ कहाँ पर है
भंवर सी घूमती है ये ज़मीं, रोको
उतर के पूछ लूं आखिर मुझे जाना कहाँ तक है
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