वक्त की आँख पे पट्टी बांध के
चोर सिपाही खेल रहे थे
रात और दिन और चाँद और मैं
जाने कैसे
इस गर्दिश में अटका पाँव
दूर गिरा जा कर मैं
जैसे
रौशनियों के धक्के से
परछाईं जमीं पर गिरती है
धेय्या छोने से पहले ही
वक्त ने चोर कहा
और
आँखे खोल के मुझको पकड़ लिया
No comments:
Post a Comment