मैं दीवार की इस जानिब हूँ
इस जानिब तो धूप भी है हरियाली भी
ओस भी गिरती है पत्तों पर
आ जाये तो आलसी कोहरा
शाख पे बैठा घंटों ऊँघता रहता है
बारिश लम्बी तारों पर नटनी की तरह थिरकती
आँखों से गुम हो जाती है
जो मौसम आता है
सारे रस देता है
लेकिन
इस कच्ची दीवार की दूसरी जानिब
क्यों ऐसा सन्नाटा है
कौन है जो आवाज नहीं करता
लेकिन
दीवार से टेक लगाए बैठा रहता है
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