Sunday, 14 December 2014

तिलस्मी

तिलस्मी शहर के मंज़र अजब हैं

अकेले रात को निकलो सियाह साटिन की सड़कों पर
तिलस्मी चेहरे ऊपर जगमगाती होर्डिंग पर झूलते हैं

सितारे झांकते हैं,नीचे सड़कों पर
वहाँ चढ़ने के जीने ढूंढने पड़ते हैं

पातालों में गुम होकर
यहाँ जीना भी जादू  है

यहाँ ख्वाब भी टांगो पर चलते हैं

उमंगें फूटती हैं
जिस तरहा पानी में रखे मूँग के दाने चटखते है
तो जुबान उगने लगती है

यहाँ दिल खर्च हो जाते हैं अकसर
कुछ नही बचता

सभी चाटे हुए पत्तल हवा में उड़ते रहते हैं

समंदर रात को जब आंख बंद करता है
ये नगरी
पहन के सारे जेवर आसमा पर अक्स अपना देखा करती है

कभी सिंदबाद भी आया होगा इस ज़ज़ीरे पर
ये आधी पानी आधी ज़मीं पर
जिन्दा मछली देखकर हैरान हुआ होगा

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