मैं जब छांव छांव चला था अपना बदन बचा कर
कि रूह को एक खूबसूरत जिस्म दे दूँ
न कोई सिलवट .न दाग कोई
न धूप झुलसे, न चोट खाएं
न जख्म छुए, न दर्द पहुंचे
बस एक कोरी कंवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ,
रूह को मैं
मगर तपी जब दोपहर दर्दों की,
दर्द की धूप से जो गुजरा
तो रूह को छांव मिल गई है .
अजीब है दर्द और तस्कीं का साँझा रिश्ता
मिलेगी छांव तो बस कहीं धूप में मिलेगी ...
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