Saturday, 6 December 2014

छाँव

मैं जब छांव छांव चला था अपना बदन बचा कर
कि रूह को एक खूबसूरत जिस्म दे दूँ

न कोई सिलवट .न दाग कोई
न धूप झुलसे, न चोट खाएं
न जख्म छुए, न दर्द पहुंचे

बस एक कोरी कंवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ,
रूह को मैं

मगर तपी जब दोपहर दर्दों की,
दर्द की धूप से जो गुजरा
तो रूह को छांव मिल गई है .

अजीब है दर्द और तस्कीं का साँझा रिश्ता
मिलेगी छांव तो बस कहीं धूप में मिलेगी ...

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