Sunday, 14 December 2014

पुरानी दास्तान

सफ़ेद चील जब थक कर कभी नीचे उतरती है
पहाड़ों को सुनाती है पुरानी दास्तान
पुराने पेड़ो की

वहां देवदार का इक ऊँचे कद का
पेड़ था पहले
वो बादल बांध लेता था
कभी पगड़ी की सूरत अपने पत्तों पर
कभी दुशाले की सूरत उसी को ओढ़ लेता था
हवा की थाम के बह कभी जब झूमता था
उसे कहता था
मेरे पांव अगर जकड़े नही होते
मैं तेरे साथ ही चलता

उधर शीशम था
कीकर से कुछ आगे
बहुत लड़ते थे वो दोनों
मगर सच है कि कीकर उसके ऊँचे कद से जलता था

सुरीली सीटियाँ बजती थी जब शीशम के पत्तों में
परिंदे बैठ के शाखों पे
उसकी नकलें करते थे

वहां इक आम भी था
जिस पर इक कोयल कई बरसों तक आती रही
जब बौर आता था

उधर दो तीन थे जो गुलमोहर
अब तक बाकी है
वो अपने जिस्म पर खोदे हुए नामों को ही सहलाता रहता है

उधर इक नाम था जो चाँदनी से इश्क करता था
नशे में नीली पड़ जाती थी सारी पत्तियां उसकी

जरा और उस तरफ परली पहाड़ी पर
बहुत से झाड़ थे जो लम्बी लम्बी सांसें लेते थे
मगर अब एक भी दिखता नही है

उस पहाड़ी पर कभी देखा नहीं
सुनते हैं
उस वादी के दामन में
बड़े बरगद के घेरे में बड़ी इक चम्पा रहती थी
जहाँ से काट ले कोई
वही से दूध बहता था
कई टुकड़ों में बेचारी गयी थी अपने जंगल से

सफ़ेद चील इक सूखे हुए से पेड़ पर बैठी
पहाड़ों को सुनाती है पुरानी दास्तानें ऊँचे पेड़ो की
जिन्हें इन पस्त कंद इंसान ने काटा है
गिराया है
कई टुकड़े किये हैं और जलाया है

No comments:

Post a Comment