तुम्हारे गम की डली उठा कर जुबान पर रख ली हैं मैंने
वह कतरा कतरा पिघल रही है मैं कतरा कतरा ही जी रहा हूँ
पिघल पिघल कर गले से उतरेगी आखरी बूंद दर्द की जब
मैं साँस की आखरी गिरह को भी खोल दूंगा
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