Sunday, 14 December 2014

देर तक

देर तक बैठे हुए दोनों ने बारिश देखी
वो दिखाती थी मुझे बिजली के तारों पे लटकती हुई बूंदें
जो ताकुब में एक दुसरे के
और एक दुसरे को छूते ही तारों से टपक जाती थीं

मुझको ये फ़िकर के
बिजली का करंट छु गया नंगी किसी तार से तो
आग के लग जाने का बायस होगा

उसने कागज़ की कई कश्तियाँ पानी में उतारीं
और ये कह के बहा दीं के
समंदर में मिलेंगे

मुझको ये फिकर के इस बार भी सैलाब का पानी
कूद के उतरेगा कोहसार से जब
तोड़ के ले जायेगा ये कच्चे किनारे

ओक में भर के वो बरसात का पानी
अधभरी झीलों को तरसाती रही

वो बहुत छोटी थी,कमसिन थी
वो मासूम बहुत थी
आबिसारों के तरन्नुम पे कदम रखती थी
और गूंजती थी

और मैं उम्र के इफ़्कार में गुम
तजुर्बे हमराह लिए
साथ ही साथ में बहता हुआ
चलता हुआ
बहता गया

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