Sunday, 14 December 2014

तमन्ना

मुझे खर्ची में पूरा दिन हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है
झपट लेता है अंटी से

कभी खीसे से गिर पड़ता है
तो गिरने की आहट भी नही होती
खरे दिन को भी मैं खोटा समझ के भूल जाता हूँ

गिरेबाँ से पकड़ के मांगने वाले भी मिलते हैं
तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है
तुझे किश्तें चुकानी हैं

जबरदस्त कोई गिरवी भी रख लेता है
ये कहकर
अभी दो चार लमहे खर्च करने के लिए रख ले
बकाया उमर के खाते में लिख देते हैं
जब होगा,हिसाब होगा

बड़ी हसरत है पूरा एक दिन एक बार मैं अपने लिए रख लूँ
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है

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