हर रोज़ जब सूरज गोरुब होता वो उसी पुल पर खड़ी उसका इंतजार करती
लेकिन
वो नही आया
एक बार फिर जिंदगी का हाथ उसकी उँगलियों से छूटने लगा
सनसेट के रंग कितने कच्चे होते हैं
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