Thursday, 25 September 2014

कुछ नही बदला

भटकती हुई आरजू से हाथ छुटा
तो दोनों जमी पे आ रहे

वो घर पहुची
तो
वो ही हुआ
जो सब दस्तानों में होता है

उसकी शादी तय हो चुकी थी
मेंहदी की महक से घर भरा हुआ था
ढोलों की थाप
सहेलियों की एडियों को जमीन नही लगने देती थी

ढोलक की थाप दूर दराज़ के मोहल्ले तक सुनाई दी

जब उसे खबर मिली
तो
वो भी पहुंचा

खिडकियों,दरवाज़ों से झांक झांक के
उसकी नजर पकड़ने की कोशिश करता रहा

मेहँदी सजी दुल्हन तक पहुंचना मुमकिन नही था

एक सहेली दुल्हन के लिए चाय की प्याली ले के आयी

उसने तो मांगी नही थी

सहेली की आँखों की पलक ने झपक के कहा

पी लो
कप में पैगाम भी है

कप की तह में उसने अंगूठी रख के भेजी थी

अंगूठी होठों से पी ली
और
ऊगली में पहन ली

सहेली की मेहँदी लगी हथेली पर उसने लिख के भेज दिया

उसी सनसेट पे मिलना
जो पुल पे मिला था

लेकिन

संदेशा पंहुचा नही

वो जा चुका था

पल भर में सब बदल गया
और
कुछ भी नही बदला

जो बदला था

वो तो गुज़र गया

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