Sunday, 7 September 2014

एक था बचपन....

एक था बचपन
छोटा सा,
नन्हा सा बचपन,
बचपन के एक बाबूजी थे,
अच्छे सच्चे बाबूजी थे
दोनो का सुंदर था बंधन,

टहनी पर चढ़के जब फूल बुलाते थे
हाथ उँचके तो टहनी तक ना जाते थे
बचपन के नन्हे दो हाथ उठाकर
वो फूलों से हाथ मिलाते थे

चलते चलते,
जाने कब इन राहों में
बाबूजी बस गये बचपन की बाहों में
मुट्ठी में बंद हैं वो सूखे फूल अभी
खुशबू हैं जीने की चाहों में

मेरे होंठों पर उनकी आवाज़ भी हैं
साँसों में सौंपा विश्वास भी हैं
जाने किस मोड़ पे कब मिल जायेंगे वो
पूछेंगे बचपन का एहसास भी है

एक था बचपन....

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