रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है
आसमां बुझाता ही नहीं
और दरिया रोशन रहता है
इतना ज़री का काम नज़र आता है
फ़लक पे तारों का
कंघी रख के दांतों में आवाज़ किया करती है हवा
कुछ फटी-फटी झीनी-झीनी,
बालिग़ होते लड़कों की तरह
इतना उंचा-उंचा बोलते हैं दो झरने आपस में
जैसे एक देहात के दोस्त
अचानक मिल कर वादी में गाँव भर का पूछते हों
नज़्म भी आधी आँखें खोल के सोती है
रात पहाड़ों पे कुछ और ही होती है.
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