न परों से उड़े न पैरों पे चले उसकी मुस्कराहट ने इतना ही कहा था बाँहों में उठा लो मुझे मुझसे चला नही जाता उस रात बाहों की इक संदली गिरह दो सांसे कुछ यूँ उलझी थी के बस इक ही साँस होती थी थी
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